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नेपाल की नीलम ने भारत के दिव्यांग को बनाया अपना जीवन साथी, समाचार पत्र बेचकर गुजारा करते हैं आशीष

Thu, 14 Feb 2019 04:45 PM IST
शाहरुख खान संजय कुमार पांडेय, अमर उजाला, महराजगंज
संजय कुमार पांडेय, अमर उजाला, महराजगंज Published by: शाहरुख खान Updated Thu, 14 Feb 2019 04:45 PM IST
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Neelam of Nepal got married to Divyang Ashish
नेपाल की नीलम अपने पति आशीष के साथ - फोटो : अमर उजाला
जब दिल से दिल मिल जाए तो मोहब्बत में हर बात पीछे छूट जाती है। घर परिवार रिश्ते नाते सब बेगाने लगने लगते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी है दिव्यांग आशीष और नीलम की, एक मुलाकात और आंखों ही आंखों में शुरू हुई प्यार की बातों ने दुनिया भर में अपने मजबूत रोटी-बेटी के संबंध के लिए जाने जाने वाले भारत-नेपाल के रिश्तों में एक और कड़ी जोड़ दी। 
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नेपाल की नीलम ने भारत के दिव्यांग आशीष को अपने जीवन में भर लिया और हमेशा के लिए एक हो गए। यह कोई कहानी या किस्सा नहीं बल्कि एक दिव्यांग की सच्ची कहानी है। निचलौल के महाशय वार्ड निवासी दिव्यांग आशीष अखबार बेचकर जिंदगी गुजर बसर करता है। 
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वहीं उनकी प्रेमिका से अर्धांगिनी बनी नीलम घर पर ही एक छोटी सी दुकान खोल पति के मेहनत में अपनी जिन्दादिली का रंग मिला रही हैं। आशीष बताते हैं कि बात 2009 की है, बोर्ड की परीक्षा शुरू होने वाली थी। 
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तब वे इंटर के छात्र थे और उनकी पत्नी नीलम हाई स्कूल की, आशीष अपनी ममेरी बहन को परीक्षा दिलाने ले जाया करते थे। वहां उनकी मुलाकात उनकी बहन की सहेली नीलम से रोज ही हो जाती थी। 
 

परीक्षा के दौरान वे एक दूसरे के इतने करीब आ गए कि फिर अलग होने के नाम से भी डरने लगे। दोनों का प्यार परवान चढ़ा तो लड़की के परिजनों को इसकी भनक लगी। फिर क्या था एक हाथ से विकलांग लड़के से रिश्ता तोड़ने का परिजन दबाव बनाने लगे। 

लेकिन नीलम तो अपनी ही जिद पर अड़ी रहीं। यह वह दौर था जब आशीष हादसों दर हादसों से उबर रहा था और इस बीच नीलम प्यार ने उसे थोडा सहारा दिया तो दुनिया को भला यह रास कैसे आ सकता था।

आशीष बताते हैं कि 2004 में खेलने के दौरान वह गिर गए और उचित इलाज के आभाव में 2005 में उनका दाया हाथ काटना पड़ गया। बेटे के हाथ कटने का सदमा राजगिर पिता रामनरेस सह नहीं पाए और दो माह बाद ही हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई।
 

दो बच्चों के लालन पालन का जिम्मा मां ने उठाया लेकिन पति की मौत और बड़े बेटे को आंखों के सामने दिव्यांग होता देख उनकी मां कलावती भी 2007 में दुनियां से चल बसीं। मां-बाप को खोने के बाद एक हाथ से दिव्यांग आशीष के कंधों पर आठ वर्षीय छोटे भाई अनूप के पालन पोषण का जिम्मा आया।

तो उसने अखबार बांटने का काम शुरू किया। सुबह सवेरे अखबार बांटने के बाद आशीष ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। संघर्षों के इसी दौर में उसके मन के बगियां में नीलम के मोहब्बत का फूल खिला। और फिर तमाम विरोध के बाद दोनों एक दूसरे के हो गए।
 
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