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शिक्षक भर्ती के फेर में फंसा ‘नैक’ मूल्यांकन
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Tue, 19 Apr 2016 09:09 PM IST
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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चार साल के अंतराल के बाद दो साल पहले गोरखपुर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने जिस उत्साह से नेशनल एसेसमेंट एक्रेडेशन काउंसिल (नैक) मूल्यांकन के लिए आवेदन किया, उतनी खामोशी से मूल्यांकन प्रक्रिया की गति पर विराम भी लगा दिया। दरअसल प्रक्रिया रोकने की वजह शिक्षकों की कमी है, जिसे दूर किए बिना यूनिवर्सिटी को अपनी ग्रेडिंग कायम रखना चुनौती होगी।
2005 में जब तत्कालीन कुलपति प्रो. अरुण कुमार ने पहली बार नैक से मूल्यांकन कराया तो भौतिक और शैक्षिक हर स्तर को बेहतर साबित करने के लिए विभागों ने दिन-रात एक कर दिया। शिक्षक पर्याप्त थे, इसलिए सफलता भी मिली और विश्वविद्यालय को B++ रैंकिंग मिली। 2010 में ग्रेडिंग की अवधि पूरी हुई।
इस दौरान हर विभाग से शिक्षक रिटायर होते गए लेकिन नियुक्तियां नहीं हुईं। नतीजा यह हुआ कि किसी भी कुलपति ने नैक मूल्यांकन के लिए आवेदन करने का साहस ही नहीं किया। जब कुलपति के रूप में प्रो. अशोक कुमार ने कमान संभाली तो एक बार फिर ‘नैक’ के मानक पर यूनिवर्सिटी को तौलने की तैयारी शुरू हुई। कुलपति के निर्देश पर आनन-फानन में यह सोचे बिना आवेदन कर दिया गया कि यूनिवर्सिटी शिक्षकों की कमी से जूझ रही है।
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ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता को ‘नैक’ के मानक पर सिद्ध करना भी यूनिवर्सिटी के लिए चुनौती बन गया। नतीजतन मूल्यांकन प्रक्रिया की गति ही धीमी कर दी गई। एक बार शिक्षक भर्ती के लिए यूनिवर्सिटी ने आवेदन प्रक्रिया शुरू की लेकिन आरक्षण के नाम पर उसे रोक देना पड़ा।
आरक्षण की नियमावली शासन की ओर से जारी हुई तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शिक्षक भर्ती को लेकर एक बार फिर कमर कसी है, लेकिन इन सब के बीच यह साफ है कि जब तक यूनिवर्सिटी प्रशासन शिक्षकों की कमी को दूर नहीं कर लेता ‘नैक’ मूल्यांकन को लेकर वह पिछले पायदान पर ही नजर आएगा। बता दें कि इस समय यूनिवर्सिटी शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रही है और सामान्य अध्यापन के लिए भी उसे रणनीति के साथ काम करना पड़ रहा है। ऐसे में शोध कार्य पर असर पड़ना तो लाजिमी है।
यह सही है कि यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की कमी ‘नैक’ मूल्यांकन में बड़ी बाधा है, लेकिन इस बाधा को दूर करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जहां तक मूल्यांकन की प्रक्रिया का सवाल है तो इस दिशा में विभागवार सेल्फ स्टडी की जा रही है। उम्मीद है कि नए सेशन में मूल्यांकन करा लिया जाएगा।
- प्रो. एचएस बाजपेयी, निदेशक, आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चयन प्रकोष्ठ
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2005 में जब तत्कालीन कुलपति प्रो. अरुण कुमार ने पहली बार नैक से मूल्यांकन कराया तो भौतिक और शैक्षिक हर स्तर को बेहतर साबित करने के लिए विभागों ने दिन-रात एक कर दिया। शिक्षक पर्याप्त थे, इसलिए सफलता भी मिली और विश्वविद्यालय को B++ रैंकिंग मिली। 2010 में ग्रेडिंग की अवधि पूरी हुई।
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इस दौरान हर विभाग से शिक्षक रिटायर होते गए लेकिन नियुक्तियां नहीं हुईं। नतीजा यह हुआ कि किसी भी कुलपति ने नैक मूल्यांकन के लिए आवेदन करने का साहस ही नहीं किया। जब कुलपति के रूप में प्रो. अशोक कुमार ने कमान संभाली तो एक बार फिर ‘नैक’ के मानक पर यूनिवर्सिटी को तौलने की तैयारी शुरू हुई। कुलपति के निर्देश पर आनन-फानन में यह सोचे बिना आवेदन कर दिया गया कि यूनिवर्सिटी शिक्षकों की कमी से जूझ रही है।
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ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता को ‘नैक’ के मानक पर सिद्ध करना भी यूनिवर्सिटी के लिए चुनौती बन गया। नतीजतन मूल्यांकन प्रक्रिया की गति ही धीमी कर दी गई। एक बार शिक्षक भर्ती के लिए यूनिवर्सिटी ने आवेदन प्रक्रिया शुरू की लेकिन आरक्षण के नाम पर उसे रोक देना पड़ा।
आरक्षण की नियमावली शासन की ओर से जारी हुई तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शिक्षक भर्ती को लेकर एक बार फिर कमर कसी है, लेकिन इन सब के बीच यह साफ है कि जब तक यूनिवर्सिटी प्रशासन शिक्षकों की कमी को दूर नहीं कर लेता ‘नैक’ मूल्यांकन को लेकर वह पिछले पायदान पर ही नजर आएगा। बता दें कि इस समय यूनिवर्सिटी शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रही है और सामान्य अध्यापन के लिए भी उसे रणनीति के साथ काम करना पड़ रहा है। ऐसे में शोध कार्य पर असर पड़ना तो लाजिमी है।
यह सही है कि यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की कमी ‘नैक’ मूल्यांकन में बड़ी बाधा है, लेकिन इस बाधा को दूर करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जहां तक मूल्यांकन की प्रक्रिया का सवाल है तो इस दिशा में विभागवार सेल्फ स्टडी की जा रही है। उम्मीद है कि नए सेशन में मूल्यांकन करा लिया जाएगा।
- प्रो. एचएस बाजपेयी, निदेशक, आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चयन प्रकोष्ठ