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दादा विलियम कैंपेयर की कर्मभूमि पर पहुंचीं जेनिफर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Fri, 11 Mar 2016 01:39 AM IST
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दादा विलियम कैंपेयर की कर्मभूमि पर पहुंचीं जेनिफर
- फोटो : amar ujala
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अंग्रेज अफसर विलियम कैंपेयर की पोती जेनिफर इन दिनों शहर में हैं। कैंपियरगंज क्षेत्र के नेतवर में दादा की विरासत देखने और शहर के पैडलेगंज ग्रेवयार्ड में मौजूद उनकी कब्र पर फूल चढ़ाने पहुंचीं जेनिफर ने हर उस स्थान को न केवल शिद्दत से देखा बल्कि उनकी यादों को सजो लेने के लिए बेचैन भी दिखीं। बचपन के आशियाने की झलक ने जहां उन्हें भावुक किया वहीं दुर्दशा ने आहत। जेनिफर के दादा के नाम पर ही कैंपियरगंज का नाम पड़ा है।
शहर के इलाहीबाग के रहने वाले शैलेंद्र श्रीवास्तव के घर ठहरीं जेनिफर ने बताया कि उनका पूरा कुनबा ब्रिटिश काल में कैंपियरगंज के नेतवर में रहता था। ऐसा दादा विलियम कैंपेयर की वहां बतौर अफसर तैनाती की वजह से था। आजादी के बाद 13 साल की उम्र में वे अपने माता-पिता के साथ ब्रिटेन तो चली गईं लेकिन अपनी जन्मभूमि की यादें उन्हें हमेशा कचोटती रहीं। वकालत का पेशा छोड़ने के बाद जब उन्हें एक बार फिर भारत आने का मौका मिला तो सन् 2000 में नैनीताल आना हुआ।
उन्होेंने बताया कि नैनीताल में ही उनकी प्राइमरी एजुकेशन हुई थी। उस दौरान ही उन्होंने अपने ड्राइवर निशी को बताया कि मेरे पुरखे गोरखपुर में रहते थे और मुझे वहां भी जाना है। 2015 में उसी ड्राइवर ने उन्हें गोरखपुर पहुंचाया। यहां आने के बाद उनकी मुलाकात शैलेंद्र श्रीवास्तव से हुई। वो उन स्वर्गीय संत प्रसाद के बेटे हैं, जो जेनिफर के दादा से जुड़े थे। उसके बाद तो जेनिफर का मनोबल ही बढ़ गया। लगातार दूसरे साल वे गोरखपुर पहुंचीं और उन सभी जगहों पर गईं, जिसका उनके बचपन से नाता है।
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जेनिफर ने नेतवर की कोठी देखी तो चहक उठीं और तमाम यादों को साझा करने लगीं। हालांकि कोठी की दुर्दशा ने उन्हें यह कहने को मजबूर कर दिया कि स्थानीय प्रशासन को इसे हेरिटेज के रूप में संरक्षित करना चाहिए। पैडलेगंज ग्रेवयार्ड पहुंचकर जेनिफर ने अपने 11 पुरखों की कब्र पर फूल चढ़ाए और उन सबसे अपने रिश्तों की कहानी बताई।
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शहर के इलाहीबाग के रहने वाले शैलेंद्र श्रीवास्तव के घर ठहरीं जेनिफर ने बताया कि उनका पूरा कुनबा ब्रिटिश काल में कैंपियरगंज के नेतवर में रहता था। ऐसा दादा विलियम कैंपेयर की वहां बतौर अफसर तैनाती की वजह से था। आजादी के बाद 13 साल की उम्र में वे अपने माता-पिता के साथ ब्रिटेन तो चली गईं लेकिन अपनी जन्मभूमि की यादें उन्हें हमेशा कचोटती रहीं। वकालत का पेशा छोड़ने के बाद जब उन्हें एक बार फिर भारत आने का मौका मिला तो सन् 2000 में नैनीताल आना हुआ।
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उन्होेंने बताया कि नैनीताल में ही उनकी प्राइमरी एजुकेशन हुई थी। उस दौरान ही उन्होंने अपने ड्राइवर निशी को बताया कि मेरे पुरखे गोरखपुर में रहते थे और मुझे वहां भी जाना है। 2015 में उसी ड्राइवर ने उन्हें गोरखपुर पहुंचाया। यहां आने के बाद उनकी मुलाकात शैलेंद्र श्रीवास्तव से हुई। वो उन स्वर्गीय संत प्रसाद के बेटे हैं, जो जेनिफर के दादा से जुड़े थे। उसके बाद तो जेनिफर का मनोबल ही बढ़ गया। लगातार दूसरे साल वे गोरखपुर पहुंचीं और उन सभी जगहों पर गईं, जिसका उनके बचपन से नाता है।
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जेनिफर ने नेतवर की कोठी देखी तो चहक उठीं और तमाम यादों को साझा करने लगीं। हालांकि कोठी की दुर्दशा ने उन्हें यह कहने को मजबूर कर दिया कि स्थानीय प्रशासन को इसे हेरिटेज के रूप में संरक्षित करना चाहिए। पैडलेगंज ग्रेवयार्ड पहुंचकर जेनिफर ने अपने 11 पुरखों की कब्र पर फूल चढ़ाए और उन सबसे अपने रिश्तों की कहानी बताई।