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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   Flood effect in Gorakhpur

मुफलिसी में बहन की बालियां बेच जुटाया राशन

Tue, 22 Aug 2017 01:16 AM IST
विवेक सिंह, अमर उजाला, गोरखपुर।
विवेक सिंह, अमर उजाला, गोरखपुर। Updated Tue, 22 Aug 2017 01:16 AM IST
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Flood effect in Gorakhpur
नाव तैयार करते मूलचंद। - फोटो : Amar Ujala
ट्रांसपोर्ट नगर से सटे चकरा अव्वल गांव के जगन्नाथ का घर बाढ़ से घिरा हुआ है। राप्ती से सटे होने की वजह से सात दिन पहले जब एकाएक बाढ़ ने उनके घर को चपेट में लिया तो पूरा परिवार सो रहा था। बमुश्किल बाढ़ से जिंदगी तो बच गई, मगर अनाज भीग गया। गैस और चूल्हा तक बाढ़ में बह गया। जैसे-तैसे रविवार तक तो काम चला, मगर सोमवार को न जेब में रुपये बचे और न ही किसी मददगार के से मिलने की आस। ऐसी मजबूरी में जगन्नाथ को छोटी बहन चंदा की बालियां बेचनी पड़ीं।
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डबडबाई आखों से अपना दर्द बयां करते हुए जगन्नाथ ने बताया कि चकरा अव्वल में उनकी आटो रिपेयर की दुकान है। परिवार में माता-पिता के साथ छोटी बहन चंदा है। बाढ़ ने पूरी दुकान को तहस-नहस कर दिया। गल्ले में स्पेयर पार्ट्स के लिए घर से लाकर रुपये रखे तो वो भी खत्म हो गए। रिश्तेदारों से मदद मांगी, पर किसी से तत्काल मदद नहीं मिली। सोमवार को राशन की चिंता हुई, तो मां ने खुद ही चंदा की बालियां लाकर हाथ में रख दीं। आत्मा तो गवाही नहीं दे रही थी, मगर कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आ रहा था। बालियां बेचकर स्टोव और महीने भर का राशन खरीदा है। मुसीबत खत्म होते ही पहला काम बहन की बालियां वापस करने का संकल्प लिया है।
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नाव बनाई और बन गए खेवनहार 

महेवा स्थित एस्तमाली इलाके में रहने वाले मूलचंद चौधरी बाढ़ की त्रासदी में फंसे लोगों के लिए खेवनहार बनकर सामने आए हैं। बाढ़ से घिरे घरवा और क्षेत्रीय लोगों को जब प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली तो मूलचंद ने 15 हजार रुपये खर्च कर नाव बना डाली। वह कहते हैं कि हर बात पर प्रशासन को कोसना ठीक नहीं है। प्रशासन दूसरे बाढ़ पीड़ितों की मदद में लगा है। हम अपना, परिवार और आसपास के लोगों की मदद कर लेंगे। 
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मजदूरी कर गुजारा चलाने वाले मूलचंद ने बताया कि उनके इलाके में सोमवार से ही पानी भरा है। उनके घर के सामने ही सात फीट से ज्यादा पानी भरा है। शुरू में पानी कम था तो जुगाड़ की नाव से काम चल जा रहा था, मगर तीन दिनों में पानी ज्यादा हो गया। इससे घर तक जरूरी सामान पहुंचाने में परेशानी होने लगी। नतीजतन 15 हजार रुपये खर्च कर जस्ते की चादर ले आए और नाव बना डाली। इससे अब खुद और आसपास के लोगों को मदद पहुंचाने में आसानी हो रही है। यह स्थायी इंतजाम है। कितना भी पानी आ जाए। राशन, पानी पहुंचाने में दिक्कत नहीं आएगी। यहीं के रहने वाले मन्नूलाल चौधरी ने बताया कि प्रशासन से कोई मदद मुहैया नहीं कराई जा रही है। कोटेदार ने केरोसिन देना बंद कर दिया है। बाढ़ से बिजली भी नहीं है। रात अंधेरे में गुजारनी पड़ रही है। आखिर कोई कितनी मोमबत्ती खरीदकर काम चलाएगा।
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