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प्राथमिक उपचार न मिलने से जान गवां रहे मासूम
अमर उजाला ब्यूरो/गोरखपुर।
Updated Mon, 08 Aug 2016 08:12 PM IST
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मेडिकल कालेज में भर्ती मरीज।
- फोटो : amar ujala
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ढाई दशक से मासूमों की मौत की वजह बनी इंसेफेलाइटिस के इलाज को लेकर स्वास्थ्य महकमे की कवायद बेअसर ही है। आज भी मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ने वाले मासूमों में 60 फीसदी ऐसे होते हैं, जिन्हें प्राथमिक उपचार ही नहीं मिल पाता या फिर झोलाछाप डॉक्टर केस बिगाड़ चुके होते हैं। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो मेडिकल कॉलेज में होने वाली मौतों में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की होती है जो केस बिगड़ने के बाद पहुंचते हैं और भर्ती होने के चंद घंटे बाद ही जान गवां देते हैं।
इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों को कम करने के लिए हर साल ही नए-नए कवायद शुरू की जाती है। मगर इन कवायदों की जमीनी हकीकत कभी वास्तविकता का रूप नहीं ले पातीं, जिससे मौतों के आंकड़े बढ़ते चले जाते हैं। मेडिकल कॉलेज में इस साल भी अब तक 120 मौतें हो चुकी हैं। डॉक्टरों की मानें तो इसमें से 60 फीसदी मौतें हुईं जरूर कॉलेज में, मगर वे जब आए थे तो उनकी स्थिति बहुत ही गंभीर थी।
स्वास्थ्य विभाग ने पिछले साल ही ईटीसी (इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर) पर जोर दिया था, मगर आज तक इसे ठीक से क्रियाशील नहीं किया जा सका। रात में शायद ही कभी यहां डॉक्टर मिलते हैं। खुद सीएमओ ने भी जब जांच की तो इसकी हकीकत सामने आ गई। अभी शनिवार को ही जंगल कौड़िया के ईटीसी सेंटर पर न तो डॉक्टर मिले और न ही दवाएं, उपकरण। जबकि इसे बनाने का उद्देश्य यही था कि झोलाछाप डॉक्टरों के पास मरीज न जाएं और उन्हें प्राथमिक इलाज देकर जान बचाई जा सके।
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मरीजों के इलाज में शुरुआत से ही लापरवाही होती है। मैं चार महीने से इंसेफेलाइटिस के 100 बेड का इंचार्ज हूं। इस दौरान मैंने जो केस देखे, उनमें 60 फीसदी मौतें ऐसे बच्चों की हुई जिन्हें प्राथमिक उपचार नहीं मिला या फिर उनका गलत इलाज हुआ। केस बिगड़ने पर ऐसे बच्चों को मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। ऐसे में इलाज सिर्फ औपचारिकता मात्र रह जाती है। बच्चों को जो डीएनएस चढ़ाया जाता है, उसका भी तय मानक होता है और अक्सर यहीं पर झोलाछाप डॉक्टर केस बिगाड़ देते हैं। ईटीसी को क्रियाशील करके बहुत हद तक ये जान बचाई जा सकती है।
- डॉ. कफील खान, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ
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इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों को कम करने के लिए हर साल ही नए-नए कवायद शुरू की जाती है। मगर इन कवायदों की जमीनी हकीकत कभी वास्तविकता का रूप नहीं ले पातीं, जिससे मौतों के आंकड़े बढ़ते चले जाते हैं। मेडिकल कॉलेज में इस साल भी अब तक 120 मौतें हो चुकी हैं। डॉक्टरों की मानें तो इसमें से 60 फीसदी मौतें हुईं जरूर कॉलेज में, मगर वे जब आए थे तो उनकी स्थिति बहुत ही गंभीर थी।
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स्वास्थ्य विभाग ने पिछले साल ही ईटीसी (इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर) पर जोर दिया था, मगर आज तक इसे ठीक से क्रियाशील नहीं किया जा सका। रात में शायद ही कभी यहां डॉक्टर मिलते हैं। खुद सीएमओ ने भी जब जांच की तो इसकी हकीकत सामने आ गई। अभी शनिवार को ही जंगल कौड़िया के ईटीसी सेंटर पर न तो डॉक्टर मिले और न ही दवाएं, उपकरण। जबकि इसे बनाने का उद्देश्य यही था कि झोलाछाप डॉक्टरों के पास मरीज न जाएं और उन्हें प्राथमिक इलाज देकर जान बचाई जा सके।
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मरीजों के इलाज में शुरुआत से ही लापरवाही होती है। मैं चार महीने से इंसेफेलाइटिस के 100 बेड का इंचार्ज हूं। इस दौरान मैंने जो केस देखे, उनमें 60 फीसदी मौतें ऐसे बच्चों की हुई जिन्हें प्राथमिक उपचार नहीं मिला या फिर उनका गलत इलाज हुआ। केस बिगड़ने पर ऐसे बच्चों को मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। ऐसे में इलाज सिर्फ औपचारिकता मात्र रह जाती है। बच्चों को जो डीएनएस चढ़ाया जाता है, उसका भी तय मानक होता है और अक्सर यहीं पर झोलाछाप डॉक्टर केस बिगाड़ देते हैं। ईटीसी को क्रियाशील करके बहुत हद तक ये जान बचाई जा सकती है।
- डॉ. कफील खान, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ