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हनुमान भक्त लाल बाबू 29 साल से रख रहे रोजा
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Sun, 26 Jun 2016 01:45 AM IST
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लाल बाबू
- फोटो : amar ujala
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आस्था और विश्वास की डोर मजबूत हो तो मजहब की दीवार कोई मायने नहीं रखती। यही मजबूत डोर गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल के रूप में सामने आती है। इसकी बानगी पेश कर रहे हैं गोरखपुर के खिलौना व्यवसायी लाल बाबू और उनकी पत्नी। दोनों जितनी शिद्दत से हनुमान की भक्ति करते हैं उतनी ही अकीदत से अल्लाह की इबादत भी। 29 साल से ये जोड़ा न केवल हनुमान जयंती को पूरी आस्था से मना रहा है बल्कि रमजान के मुकद्दस महीने में रोजा रखकर अपने जीवन को पाक करने की कोशिश में जुटा है।
भक्ति के साथ इबादत का तालमेल आखिर कैसे बना इसकी तहकीकात में 45 वर्षीय खिलौना व्यवसायी लाल बाबू बताते हैं कि यह सिलसिला पिता के समय से शुरू हुआ। बात सन् 1952 की है, जब पिता गंगा बाबू ने खुदा से मन्नत मांगी कि यदि व्यवसाय व्यवस्थित हो जाए तो वे रमजान में रोजा रखेंगे। फरियाद कबूल हुई और घंटाघर जैसे व्यस्त चौराहे पर उन्हें दुकान मिल गई। उन्होंने खिलौने का व्यवसाय शुरू किया और रब की रहमत से व्यवसाय खूब फला-फूला।
पिता की इबादत का असर लाल बाबू के जेहन पर चस्पा था, सो जब उन्हें लगातार दो पुत्रियां पैदा हुईं तो उन्होंने पुत्र के लिए रोजा रखने की मन्नत मांगी। खुदा की रहमत एक बार फिर बरसी, लाल बाबू को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गई। फिर तो जैसे उनके पूरे परिवार का ही विश्वास जम गया। वह दिन है और आज का दिन लाल बाबू हर रमजान महीने को पूरी पाकीजगी से मनाते हैं। उनकी इबादत में सारी रवायतें पूरी होेती हैं। अल सुबह सहरी और शाम के बाद इफ्तारी के अलावा रोजे के दौरान दी जाने वाली सदका और फित्र की रवायत को भी लालबाबू बखूबी पूरा करते हैं।
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खास बात यह है कि उनकी इस इबादत में पत्नी गीतांजलि भी अर्धागिंनी होने का पूरा धर्म निभाती हैं। वह सिर्फ रोजा ही नहीं रखती बल्कि इसके लिए लाल बाबू का उत्साह भी बढ़ाती हैं। लाल बाबू बताते हैं कि उनका पुत्र प्रिंस भी रोजे की परंपरा को आगे बढ़ाने का ख्वाहिशमंद है।
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भक्ति के साथ इबादत का तालमेल आखिर कैसे बना इसकी तहकीकात में 45 वर्षीय खिलौना व्यवसायी लाल बाबू बताते हैं कि यह सिलसिला पिता के समय से शुरू हुआ। बात सन् 1952 की है, जब पिता गंगा बाबू ने खुदा से मन्नत मांगी कि यदि व्यवसाय व्यवस्थित हो जाए तो वे रमजान में रोजा रखेंगे। फरियाद कबूल हुई और घंटाघर जैसे व्यस्त चौराहे पर उन्हें दुकान मिल गई। उन्होंने खिलौने का व्यवसाय शुरू किया और रब की रहमत से व्यवसाय खूब फला-फूला।
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पिता की इबादत का असर लाल बाबू के जेहन पर चस्पा था, सो जब उन्हें लगातार दो पुत्रियां पैदा हुईं तो उन्होंने पुत्र के लिए रोजा रखने की मन्नत मांगी। खुदा की रहमत एक बार फिर बरसी, लाल बाबू को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गई। फिर तो जैसे उनके पूरे परिवार का ही विश्वास जम गया। वह दिन है और आज का दिन लाल बाबू हर रमजान महीने को पूरी पाकीजगी से मनाते हैं। उनकी इबादत में सारी रवायतें पूरी होेती हैं। अल सुबह सहरी और शाम के बाद इफ्तारी के अलावा रोजे के दौरान दी जाने वाली सदका और फित्र की रवायत को भी लालबाबू बखूबी पूरा करते हैं।
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खास बात यह है कि उनकी इस इबादत में पत्नी गीतांजलि भी अर्धागिंनी होने का पूरा धर्म निभाती हैं। वह सिर्फ रोजा ही नहीं रखती बल्कि इसके लिए लाल बाबू का उत्साह भी बढ़ाती हैं। लाल बाबू बताते हैं कि उनका पुत्र प्रिंस भी रोजे की परंपरा को आगे बढ़ाने का ख्वाहिशमंद है।