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फाइटर की उड़ान, जमीन का रकबा तय करेगा एम्स का भविष्य

Fri, 08 Jul 2016 08:58 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Updated Fri, 08 Jul 2016 08:58 PM IST
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central team checked the land for aiims
गन्ना शोध संस्‍थान में एम्स के लिए जमीन का निरीक्षण करने आई टीम के साथ जिलाधिकारी। - फोटो : rajesh kumar
एयरफोर्स की तरफ से निर्माण के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र का दायरा, फाइटर प्लेन की उड़ान की स्थिति और प्रस्तावित जमीन का रकबा, गोरखपुर में एम्स के  निर्माण का भविष्य तय करेगी। जमीन का निरीक्षण करने आई चार सदस्यीय टीम का नेतृत्व कर रहे ज्वाइंट सेक्रेटरी (पीएमएसएसवाई) सुनील शर्मा ने बताया कि जमीन की लोकेशन अच्छी है। शहर के बीचों-बीच होने के साथ ही सड़क से कनेक्टिविटी, पास में ही एयरपोर्ट और एनईआर का मुख्यालय, बिजली, पानी कई ऐसी सुविधाएं हैं जो एम्स के मानकों को पूरी करती हैं। मगर दो ऐसे तकनीकी पहलू हैं जिन पर संबंधित मंत्रालय ही फैसला ले सकेगा। इसके बाद ही यह तय हो सके गा क ी इस जमीन पर एम्स बनेगा या नहीं।
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ज्वाइंट सेक्रेटरी ने कहा कि गन्ना शोध संस्थान की जमीन 111 एकड़ है जो मानक से कम है। नागपुर में 150 एकड़ में बने एम्स का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वहां बाद में कुछ विभागों में सुपर स्पेशियलिटी बनाने की जरूरत पड़ी मगर जमीन कम पड़ गई। इसके बाद विशेषज्ञों ने एम्स के लिए जरूरी जमीन के मानक में बदलाव कर उसे दो सौ एकड़ कर दिया। हालांकि कुछ जगहों पर इससे कम जमीन पर भी एम्स बना है। पश्चिम बंगाल में 190 एकड़ में, आंध्र प्रदेश में 173 एकड़ जमीन में ही एम्स बना है। ऐसे में यहां की जमीन एम्स के लिए पर्याप्त है कि नहीं, इसका फैसला स्वास्थ्य मंत्रालय ही करेगा।
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उन्होंने बताया कि इसी तरह एक और तकनीकी दिक्कत सामने आ रही है। इस जमीन के एयरफोर्स से नजदीक होने से यह जांचना होगा कि निर्माण और बहुमंजिली इमारतों को लेकर एयरफोर्स का कोई प्रतिबंध तो आड़े नहीं आ रहा है? इस पर डीएम ओएन सिंह ने बताया कि एयरफोर्स की बाउंड्री के 100 मीटर और उनके  बारूदखाने से 900 मीटर के दायरे में निर्माण नहीं कराया जा सकता। गन्ना शोध संस्थान की जमीन दोनों ही दायरों से बाहर है। मगर ऊंचाई में होने वाले निर्माण की शर्तों को न तो टीम स्पष्ट कर सकी और न ही जिला प्रशासन। टीम में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के वरिष्ठ आर्किटेक्ट राजीव कन्नौजिया, पीजीआई चंडीगढ़ के अधीक्षण अभियंता पीएस सैनी तथा एम्स नई दिल्ली के डीके शर्मा शामिल रहे।
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जमीन विवादित नहीं होने का मांगा प्रमाण
टीम ने गन्ना शोध संस्थान और जिला प्रशासन से लिखित में जमीन के विवादित नहीं होने का प्रमाण मांगा। इस पर डीएम के निर्देश पर तहसील प्रशासन और गन्ना शोध संस्थान ने टीम को यह लिखकर दिया कि प्रस्तावित जमीन को लेकर किसी भी कोर्ट में कोई मुकदमा नहीं चल रहा है। 

सीवर से लेकर सिस्मिक जोन तक की जानकारी ली 
केंद्रीय टीम ने एम्स के लिए जरूरी कई मानकों का बारीक निरीक्षण किया। मसलन प्रस्तावित जमीन के आस-पास पीने के पानी की स्थिति और शहर में सीवर की व्यवस्था और भूकंप के मद्देनजर गोरखपुर किस सिस्मिक जोन में आता है। डीएम ने बताया कि शहर का पानी अच्छा है। सीवर के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि आधे से अधिक शहर का पानी रामगढ़ताल में गिरता है, जहां सफाई के लिए दो एसटीपी लगे हैं।

इसी तरह आधे शहर का पानी राप्ती में गिरता है। वहां भी एक एसटीपी के लिए डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार हो गई है। भूकंप की स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि गोरखपुर सिस्मिक जोन चार में आता है। इस पर टीम ने अपनी फाइल में इसे अलग से कोट भी किया। टीम ने यह भी पूछा कि संस्थान के परिसर में बने मकान कितने पुराने हैं। उनका कहना था कि इससे उन्हें गिराने में कितना समय लगेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकेगा।   

हम भी चाहते हैं एम्स बने
केंद्रीय टीम ने कहा कि वे भी चाहते हैं कि गोरखपुर में एम्स बने। इसे लेकर डेढ़ साल से अभ्यास चल रहा है। बिना राज्य सरकार की पहल के केंद्रीय टीम इससे पहले भी खुटहन में एक जमीन का मुआयना कर चुकी है। मगर कोर्ट में मामला फंसने से वहां बात नहीं बन सकी। 


लटके रहे संस्थान में रह रहे परिवारों के चेहरे 
एक तरह एम्स के निर्माण की संभावना से जहां हर चेहरे पर चमक थी, वहीं गन्ना शोध संस्थान में रह रहे कर्मचारियों और उनके परिवार वालों के चेहरे मुरझाए हुए थे। उन्हें वहां से हटाए जाने का खतरा सता रहा है। साथ ही कई सवाल भी मसलन अब उन्हें कहां बसाया जाएगा? उनके बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे? नया घर मुफीद होगा कि नहीं आदि? खुलकर तो नहीं मगर दबी जुबान सभी यह सवाल दोहरा रहे थे कि अब उनका क्या होगा?
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