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एंबुलेंस नहीं इसे टैक्सी कहिए
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Updated Sun, 27 Mar 2016 12:53 AM IST
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एंबुलेंस
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शिवम सिंह
सरकारी अस्पतालों के इर्द गिर्द खड़े होने वाले एंबुलेंस को टैक्सी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। प्राइवेट एंबुलेंस सिर्फ नाम की ही है। असल में जो सुविधा एंबुलेंस में होनी चाहिए वह इनमें उपलब्ध नहीं है। यहां तक की ऑक्सीजन सिलिंडर, स्ट्रेचर तक नहीं होता। ऐसे में मरीज भगवान भरोसे ही मेडिकल कॉलेज या फिर प्राइवेट अस्पताल तक पहुंचता है। इस संबंध में जब तीमारदार कुछ सवाल करते हैं तो रास्ते में दुकान पर सभी किट होने की बात कहकर यह बुकिंग करते हैं और मरीजों की जान खतरे में डालकर ले जाते हैं।
मरीजों को मुफ्त चिकित्सकीय सेवा मुहैया कराने के लिए दवा, इलाज के साथ ही एंबुलेंस सेवा मुफ्त है। जिले में 108 की 23, 102 सेवा की 44 एंबुलेंस के अलावा पांच एंबुलेंस अस्पताल के पास है। वहीं मेडिकल कॉलेज में आठ एंबुलेंस है, जो आठ रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से सेवा देते हैं। इन सब के बावजूद जरूरत पड़ने पर तीमारदारों को ज्यादा रुपये देने पड़ते हैं। वह भी जान जोखिम में डालकर।
जिला अस्पताल में सीएमओ के अधीन एंबुलेंस है जो खड़ी-खड़ी सड़ रही है। वहीं 108 या 102 के सेवा विस्तार की योजना तो बनी मगर उसका लिखा पढ़ी में कोई आदेश नहीं आया। ऐसे में इमरजेंसी पड़ने पर एंबुलेंस के दलाल तीमारदार को ऐसा समझाते हैं कि वह नहीं पहुंचाया तो उनकी जान ही चली जाएगी। परेशान लोगों को यही सच्चे मददगार नजर आते हैं और मजबूरी में मुफ्त की सेवा का पांच सौ से दो हजार रुपये देते हैं। इसकी कीमत भी वक्त पर निर्भर करता है। समय यदि रात का है तो रुपया भी ज्यादा लगेगा है। मेडिकल कॉलेज में तो आठ में से पांच एंबुलेंस कबाड़ हो चुकी है, जो चालू हालत में ही नहीं है।
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मानकों की अनदेखी
एंबुलेंस के नाम पर इन गाड़ियों को रजिस्ट्रेशन में भी फायदा मिलता है। नियमानुसार रजिस्ट्रेशन के समय इनमें सारे जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए। रजिस्ट्रेशन में भी नियमों की भी अनदेखी की जा रही है।
कभी नहीं हुई चेकिंग
सड़कों पर दौड़ रही प्राइवेट एंबुलेंस में जीवन रक्षक उपकरण है या नहीं इसकी हकीकत जाननेे की जहमत जिम्मेदार अफसरों ने कभी नहीं उठाई। स्वास्थ्य विभाग और न तो आरटीओ ने हकीकत जानने का प्रयास किया। बस नीली बत्ती हूटर का सहारा लेकर यह फर्राटे भरते हैं।
एंबुलेंस में आवश्यक उपकरण के निगरानी की जिम्मेदारी स्वास्थ्य अफसरों की होती है। ऐसी कोई शिकायत कभी आई नहीं है यदि ऐसा है तो कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. एमके सिंह, सीएमओ
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सरकारी अस्पतालों के इर्द गिर्द खड़े होने वाले एंबुलेंस को टैक्सी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। प्राइवेट एंबुलेंस सिर्फ नाम की ही है। असल में जो सुविधा एंबुलेंस में होनी चाहिए वह इनमें उपलब्ध नहीं है। यहां तक की ऑक्सीजन सिलिंडर, स्ट्रेचर तक नहीं होता। ऐसे में मरीज भगवान भरोसे ही मेडिकल कॉलेज या फिर प्राइवेट अस्पताल तक पहुंचता है। इस संबंध में जब तीमारदार कुछ सवाल करते हैं तो रास्ते में दुकान पर सभी किट होने की बात कहकर यह बुकिंग करते हैं और मरीजों की जान खतरे में डालकर ले जाते हैं।
मरीजों को मुफ्त चिकित्सकीय सेवा मुहैया कराने के लिए दवा, इलाज के साथ ही एंबुलेंस सेवा मुफ्त है। जिले में 108 की 23, 102 सेवा की 44 एंबुलेंस के अलावा पांच एंबुलेंस अस्पताल के पास है। वहीं मेडिकल कॉलेज में आठ एंबुलेंस है, जो आठ रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से सेवा देते हैं। इन सब के बावजूद जरूरत पड़ने पर तीमारदारों को ज्यादा रुपये देने पड़ते हैं। वह भी जान जोखिम में डालकर।
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जिला अस्पताल में सीएमओ के अधीन एंबुलेंस है जो खड़ी-खड़ी सड़ रही है। वहीं 108 या 102 के सेवा विस्तार की योजना तो बनी मगर उसका लिखा पढ़ी में कोई आदेश नहीं आया। ऐसे में इमरजेंसी पड़ने पर एंबुलेंस के दलाल तीमारदार को ऐसा समझाते हैं कि वह नहीं पहुंचाया तो उनकी जान ही चली जाएगी। परेशान लोगों को यही सच्चे मददगार नजर आते हैं और मजबूरी में मुफ्त की सेवा का पांच सौ से दो हजार रुपये देते हैं। इसकी कीमत भी वक्त पर निर्भर करता है। समय यदि रात का है तो रुपया भी ज्यादा लगेगा है। मेडिकल कॉलेज में तो आठ में से पांच एंबुलेंस कबाड़ हो चुकी है, जो चालू हालत में ही नहीं है।
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मानकों की अनदेखी
एंबुलेंस के नाम पर इन गाड़ियों को रजिस्ट्रेशन में भी फायदा मिलता है। नियमानुसार रजिस्ट्रेशन के समय इनमें सारे जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए। रजिस्ट्रेशन में भी नियमों की भी अनदेखी की जा रही है।
कभी नहीं हुई चेकिंग
सड़कों पर दौड़ रही प्राइवेट एंबुलेंस में जीवन रक्षक उपकरण है या नहीं इसकी हकीकत जाननेे की जहमत जिम्मेदार अफसरों ने कभी नहीं उठाई। स्वास्थ्य विभाग और न तो आरटीओ ने हकीकत जानने का प्रयास किया। बस नीली बत्ती हूटर का सहारा लेकर यह फर्राटे भरते हैं।
एंबुलेंस में आवश्यक उपकरण के निगरानी की जिम्मेदारी स्वास्थ्य अफसरों की होती है। ऐसी कोई शिकायत कभी आई नहीं है यदि ऐसा है तो कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. एमके सिंह, सीएमओ