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दीनानाथ की ताजियादार सावित्री
Updated Wed, 20 Sep 2017 01:08 AM IST
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आशुतोष मिश्र/गोरखपुर।
‘भगवान का घर होता है इंसान के दिल में, मंदिर-मस्जिद में अल्लाह और भगवान नहीं है। मजहब के नाम पर आपस में लड़ा दे, गीता भी नहीं है वो कुरान नहीं है।’ बरेली के राजेंद्र सक्सेना की इन लाइनों को तिवारीपुर में दीनानाथ का परिवार जी रहा है। इनकी देहरी के भीतर जहां नवरात्र पर देवी पूजी जाएंगी, वहीं मोहर्रम की ताजियादारी भी होगी। पूजा-इबादत और श्रद्धा-अकीदत का यह संगम जहां गंगा-जमुनी तहजीब की सशक्त मिसाल है, वहीं तमाम लोगों के लिए सबक भी। बड़ी मिसाल यह भी है कि करीब तीन दशक पहले दीनानाथ ने घर की चौहद्दी से ताजियेदारी की जो नायाब शुरुआत की थी उसे कायम रखने के लिए पत्नी सावित्री भी पीछे नहीं हैं। पति के न रहने पर इस साल ‘दीनी तालीम’ पर आधारित ताजियेदारी का सिलसिला सावित्री के हाथों ही आगे बढ़ेगा।
दीनानाथ के आंगन से मोहर्रम के ताजियेदारी की शुरुआत की बुनियादी पड़ी परिवार में आई एक विपत्ती से। तीन दशक पहले बीमार बेटी के स्वस्थ न होने पर दीनानाथ ने बेटी के स्वस्थ होने की कामना के साथ ताजियेदारी की मन्नत मांगी थी। बेटी की सेहत सुधरी तो मनौती पूरी करने के क्रम में मोहर्रम पर ताजियेदारी का सिलसिला भी शुरू कर दिया। घर के सदस्यों को तालीम भी दी कि नेक नीयत और ऊपर वाले पर भरोसा हर धर्म का मूल है, बेवजह की दीवारें न खींचें। देखते-देखते उनके पूजा कक्ष में देवी-देवताओं की तस्वीरों के साथ मक्का-मदीना का अक्स भी नजर आने लगा। ठाकुर बाबा के स्थान के पास दीनानाथ ने इमाम चौक स्थापित कराया। वह 29 साल तक मोहर्रम पर घर में हजरत इमाम हुसैन की याद में ताजिया बनाते रहे। पूरी अकीदत के साथ कर्बला ले जाकर उन्हें दफनाते भी थे। इस साल 21 मई को दीनानाथ ने शरीर त्याग दिया लेकिन दीनानाथ की दी हुई ‘दीनी तालीम’ परिवार के सदस्यों में रची-बसी है।
दीनानाथ की पत्नी सावित्री बताती हैं, उनके निधन के बाद कुछ मुस्लिम भाई परिसर से ताजियेदारी शिफ्ट करने का प्रस्ताव लेकर आए थे लेकिन मैंने उन्हें लौटा दिया। कहा, जब तक मेरी जिंदगी है पति की ताजियेदारी वाली मन्नत को सालाना परंपरा की तरह पूरा करूंगी।
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जुटते हैं हजरत के मुरीद
सावित्री बताती हैं कि पति की दुआ से कइयों की तकलीफ हजरत इमाम हुसैन ने दूर कर दी थीं। यह सब देखते-देखते उनके प्रति आस्था गहरी होती गई। हर बार ताजियादारी में पूरा परिवार उनका साथ देता था। इस बार बेटे अशोक, अनिल और छोटू ने मेरा हौसला बढ़ाया है।
‘भगवान का घर होता है इंसान के दिल में, मंदिर-मस्जिद में अल्लाह और भगवान नहीं है। मजहब के नाम पर आपस में लड़ा दे, गीता भी नहीं है वो कुरान नहीं है।’ बरेली के राजेंद्र सक्सेना की इन लाइनों को तिवारीपुर में दीनानाथ का परिवार जी रहा है। इनकी देहरी के भीतर जहां नवरात्र पर देवी पूजी जाएंगी, वहीं मोहर्रम की ताजियादारी भी होगी। पूजा-इबादत और श्रद्धा-अकीदत का यह संगम जहां गंगा-जमुनी तहजीब की सशक्त मिसाल है, वहीं तमाम लोगों के लिए सबक भी। बड़ी मिसाल यह भी है कि करीब तीन दशक पहले दीनानाथ ने घर की चौहद्दी से ताजियेदारी की जो नायाब शुरुआत की थी उसे कायम रखने के लिए पत्नी सावित्री भी पीछे नहीं हैं। पति के न रहने पर इस साल ‘दीनी तालीम’ पर आधारित ताजियेदारी का सिलसिला सावित्री के हाथों ही आगे बढ़ेगा।
दीनानाथ के आंगन से मोहर्रम के ताजियेदारी की शुरुआत की बुनियादी पड़ी परिवार में आई एक विपत्ती से। तीन दशक पहले बीमार बेटी के स्वस्थ न होने पर दीनानाथ ने बेटी के स्वस्थ होने की कामना के साथ ताजियेदारी की मन्नत मांगी थी। बेटी की सेहत सुधरी तो मनौती पूरी करने के क्रम में मोहर्रम पर ताजियेदारी का सिलसिला भी शुरू कर दिया। घर के सदस्यों को तालीम भी दी कि नेक नीयत और ऊपर वाले पर भरोसा हर धर्म का मूल है, बेवजह की दीवारें न खींचें। देखते-देखते उनके पूजा कक्ष में देवी-देवताओं की तस्वीरों के साथ मक्का-मदीना का अक्स भी नजर आने लगा। ठाकुर बाबा के स्थान के पास दीनानाथ ने इमाम चौक स्थापित कराया। वह 29 साल तक मोहर्रम पर घर में हजरत इमाम हुसैन की याद में ताजिया बनाते रहे। पूरी अकीदत के साथ कर्बला ले जाकर उन्हें दफनाते भी थे। इस साल 21 मई को दीनानाथ ने शरीर त्याग दिया लेकिन दीनानाथ की दी हुई ‘दीनी तालीम’ परिवार के सदस्यों में रची-बसी है।
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दीनानाथ की पत्नी सावित्री बताती हैं, उनके निधन के बाद कुछ मुस्लिम भाई परिसर से ताजियेदारी शिफ्ट करने का प्रस्ताव लेकर आए थे लेकिन मैंने उन्हें लौटा दिया। कहा, जब तक मेरी जिंदगी है पति की ताजियेदारी वाली मन्नत को सालाना परंपरा की तरह पूरा करूंगी।
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जुटते हैं हजरत के मुरीद
सावित्री बताती हैं कि पति की दुआ से कइयों की तकलीफ हजरत इमाम हुसैन ने दूर कर दी थीं। यह सब देखते-देखते उनके प्रति आस्था गहरी होती गई। हर बार ताजियादारी में पूरा परिवार उनका साथ देता था। इस बार बेटे अशोक, अनिल और छोटू ने मेरा हौसला बढ़ाया है।