{"_id":"59c1722b4f1c1b35688b572c","slug":"61505849899-gorakhpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"तश्ना आलमी के निधन पर शोक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
तश्ना आलमी के निधन पर शोक
Updated Wed, 20 Sep 2017 01:11 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
गोरखपुर। देशज शब्दों में शायरी करने वाले मशहूर शायर तश्ना आलमी नहीं रहे। लखनऊ स्थित आवास पर 18 सितंबर को उनका इंतकाल हो गया। देवरिया के सलेमपुर स्थित श्यामपुर गांव में पैदा हुए फज्लुर्रहमान जब 10 वर्ष के थे तो उनकी मां का निधन हो गया। ऐसे में पालन-पोषण के लिए वह बड़ी बहन के साथ गोरखपुर आ गए। हकीम वशी अहमद उनके बहनोई थे। उन्हीं के यहां रहकर उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की। शायरी का शौक बचपन से ही था। बड़े हुए तो तखल्लुस तश्ना आलमी रख लिया और फिर यही नाम उनकी पहचान बन गया।
‘हटो कांधे से आंसू पोछ डालो, वो देखो रेलगाड़ी आ रही है। मैं तुमको छोड़कर नहीं जाता, गरीबी मुझको लेके जा रही है’। वह ऐसे ही आसान लफ्जों में गंभीर बातें कहने की कला बखूबी जानते थे। 1967 में बंबई फिल्म डिवीजन में उन्हें जब नौकरी मिली तो बहन ने उनका रिश्ता तय कर दिया। जब वह लौटे तो गोरखपुर और लखनऊ ने हमेशा उनका दामन थामे रखा और फिर कभी उन्हें बाहर नहीं जाने दिया। ‘कनात जब कभी करते थे हम थोड़े से सत्तू से, नमक पाशी भी उस पर खुद-ब-खुद होती थी आंसू से। मुसीबत के अच्छे दिन हमें जब याद आते हैं, न जाने भूख मिट जाती है क्यों खाने की खुश्बू से।’ ताश्ना की कलम से निकला यह कलाम आम आदमी के दर्द और जद्दोजहद को बड़ी आसानी से बया करता है। उर्दू जबान के कुछ खुदमुख्तारों की वजह से उन्हें वह इज्जत और शोहरत नहीं मिल पाई जो उन्हें बख्शी जानी चाहिए थी। ताजिन्दगी गुमनामियों के अंधेरों से जूझते रहे ताश्ना ने इन हालात पर भी अपने लहजे में कहा था ‘हमें दुश्मन मिटाना चाहते हैं समंदर को सुखाना चाहते हैं। जरा इनकी हिमाकत आप देखें ये सूरज को बुझाना चाहते हैं।
इनसेट
प्रगतिशील लेखक संघ ने जताया शोक
गोरखपुर। प्रगतिशील लेखक संघ ने मंगलवार को बैठक कर उर्दू के मशहूर शायर तश्ना आलमी के निधन पर गहरा शोक जताया। संघ के सदस्य महेश अश्क ने कहा कि तश्ना आलमी उर्दू के नए लहजे के शायर थे। उनकी शायरी में प्रगतिशील विचारों की झलक नजर आती थी। उन्होंने अपना काफी समय गोरखपुर में बिताया। इस दौरान संघ के अध्यक्ष रवींद्र श्रीवास्तव जुगानी, महासचिव भरत शर्मा, उपाध्यक्ष कलीमुल्ला हक, आशिफ सईद आदि मौजूद रहे।
‘हटो कांधे से आंसू पोछ डालो, वो देखो रेलगाड़ी आ रही है। मैं तुमको छोड़कर नहीं जाता, गरीबी मुझको लेके जा रही है’। वह ऐसे ही आसान लफ्जों में गंभीर बातें कहने की कला बखूबी जानते थे। 1967 में बंबई फिल्म डिवीजन में उन्हें जब नौकरी मिली तो बहन ने उनका रिश्ता तय कर दिया। जब वह लौटे तो गोरखपुर और लखनऊ ने हमेशा उनका दामन थामे रखा और फिर कभी उन्हें बाहर नहीं जाने दिया। ‘कनात जब कभी करते थे हम थोड़े से सत्तू से, नमक पाशी भी उस पर खुद-ब-खुद होती थी आंसू से। मुसीबत के अच्छे दिन हमें जब याद आते हैं, न जाने भूख मिट जाती है क्यों खाने की खुश्बू से।’ ताश्ना की कलम से निकला यह कलाम आम आदमी के दर्द और जद्दोजहद को बड़ी आसानी से बया करता है। उर्दू जबान के कुछ खुदमुख्तारों की वजह से उन्हें वह इज्जत और शोहरत नहीं मिल पाई जो उन्हें बख्शी जानी चाहिए थी। ताजिन्दगी गुमनामियों के अंधेरों से जूझते रहे ताश्ना ने इन हालात पर भी अपने लहजे में कहा था ‘हमें दुश्मन मिटाना चाहते हैं समंदर को सुखाना चाहते हैं। जरा इनकी हिमाकत आप देखें ये सूरज को बुझाना चाहते हैं।
विज्ञापन
इनसेट
प्रगतिशील लेखक संघ ने जताया शोक
गोरखपुर। प्रगतिशील लेखक संघ ने मंगलवार को बैठक कर उर्दू के मशहूर शायर तश्ना आलमी के निधन पर गहरा शोक जताया। संघ के सदस्य महेश अश्क ने कहा कि तश्ना आलमी उर्दू के नए लहजे के शायर थे। उनकी शायरी में प्रगतिशील विचारों की झलक नजर आती थी। उन्होंने अपना काफी समय गोरखपुर में बिताया। इस दौरान संघ के अध्यक्ष रवींद्र श्रीवास्तव जुगानी, महासचिव भरत शर्मा, उपाध्यक्ष कलीमुल्ला हक, आशिफ सईद आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन