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आयुष्मान
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आयुष्मान का आशीर्वाद 835 को ही मिला
77 हजार में 10 हजार 585 को मिले गोल्डेन कॉर्ड
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। आयुष्मान भारत योजना का लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की ओर से हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन जिले में यह योजना ठीक ढंग से लागू नहीं हो पा रही है। इसका मुख्य कारण यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बताई जा रही है। इसके चलते मरीजों को महानगरों की ओर रुख करना पड़ता है।
आयुष्मान भारत योजना शुरू हुए कई महीने बीत गए लेकिन अभी तक जिले में सिर्फ 835 लोगों ने ही इस योजना का लाभ लिया है, जबकि एक लाख 69 हजार परिवारों को इस योजना के तहत लाभ दिए जाने का लक्ष्य है। यही नहीं, ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिनके नाम सूची में गलत दर्ज हो गए हैं और अब उन्हें नाम सही कराने के लिए स्वास्थ्य महकमे का चक्कर लगाना पड़ रहा है। बहुत से पात्र ऐसे हैं, जिनके मोबाइल नंबर ही बदल गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में 77 हजार पात्र लोगों को गोल्डन कार्ड वितरित किया जाना है। इनमें से अब तक 10 हजार 585 लोगों को गोल्डन कार्ड दिए गए हैं। सीएमओ जेएलएम कुशवाहा का कहना है कि पात्रों को योजना का लाभ मिले, इसके लिए विभाग की ओर से हर संभव कोशिश की जा रही है।
इलाज के लिए 17 अस्पताल चिह्नित
आयुष्मान भारत योजना का लाभ अधिक से अधिक लोगों को मिल सके। इसके लिए जिले में 17 अस्पताल चिह्नित हैं। इनमें तीन सरकारी अस्पताल भी शामिल हैं। चिह्नित अस्पतालों में जिला अस्पताल, जिला महिला चिकित्सालय, ओपेके चिकित्सालय कैली, संतकबीर आई हास्पिटल, नवयुग मेडिकल सेंटर, श्री कृष्णा मिशन हास्पिटल, ज्यान हास्पिटल, पूर हास्पिटल, खैर मेमोरियल हास्पिटल, पीएमसी हॉस्पिटल, बस्ती ट्रॉमा सेंटर, एसआर हॅास्पिटल, तथास्तु इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, जेजे हॉस्पिटल, अकक्ष्य हॉस्पिटल, अयोध्या आई हॅास्पिटल, बस्ती केयर सेंटर आदि शामिल हैं।
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जिला अस्पताल में घूम रहे स्वाइन फ्लू के वाहक
वर्ष 2019 में स्वाइन फ्लू का पहला मरीज मिला
वर्ष 2017 में जिले में स्वाइन फ्लू से हुई तीन मौतें
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। स्वाइन फ्लू को लेकर सरकार गंभीर है और इसकी रोकथाम के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जिला अस्पताल में इस बीमारी को लेकर कोई एहतियात नहीं बरती जा रही है। अस्पताल परिसर में बेरोक यहां स्वाइन फ्लू के वाहक घूम रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पताल प्रशासन इससे बेखबर है।
वर्ष 2019 में तीन फरवरी तक देश में स्वाइन फ्लू के कुल 6701 मामले सामने आए हैं, जिसके चलते अब तक 226 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद भी जिला चिकित्सालय इस बीमारी को लेकर गंभीर नहीं हुआ है। अस्पताल परिसर में मेन गेट से घुसते ही दाहिनी साइड में कूड़े का ढेर लगा हुआ है, यह साधारण कूड़ा नहीं है। यह बायोवेस्ट है, जिसमें इस्तेमाल की हुई सुई, रूई, पट्टी व दवाओं के डिब्बे आदि शामिल हैं। इनसे उठती दुर्गंध के चलते इस ओर से गुजरना कोई मुनासिब नहीं समझता। जहां यह कूड़े पड़े हैं। ठीक उसी के पीछे डॉक्टरों की कॉलोनी है और कुष्ठ रोग निदान केंद्र भी स्थापित है। कूड़े के ढेर में स्वाइन फ्लू के वाहक यानी की सुअरों की तादाद आपको दिख जाएगी। ये सुअर बेरोक अस्पताल परिसर में घूम रहे हैं। इसके चलते लोगों में स्वाइन फ्लू का खतरा भी बना हुआ है।
जिले में मिला स्वाइन फ्लू का मरीज
सोमवार को जिले में स्वाइन फ्लू का मरीज मिलने से स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। वर्ष 2019 में यह पहला मामला है। शहर के महरीखांवा निवासी अजय चौधरी को इंफ्लूएंजा एच 1 एच 1 पाजिटिव पाया गया है। चौधरी का इलाज लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में चल रहा है। वर्ष 2017 में जिले में 13 मरीज स्वाइन फ्लू से पीड़ित मिले थे। इनमें से तीन की मौत हो गई थी। मृतकों में एक नगरीय क्षेत्र का तथा दो ग्रामीण क्षेत्र के थे। वर्ष 2018 में कोई भी मामला सामने नहीं आया था।
अधिकारी की सुनिए
प्रभारी एसआईसी डॉ वीके मिश्रा कहते हैं कि अस्पताल में साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है, सुअर घूमने की बात पर कहा कि इसे लेकर मुझे कोई जानकारी नहीं।
स्वास्थ्य महकमे के लिए सिर दर्द बने पैरामेडिकल कॉलेज
दो पैरामेडिकल कॉलेजों की चल रही जांच
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। जिले में पैरामेडिकल कॉलेजों की भरमार है। कौन रजिस्टर्ड है और कौन फर्जी। इसकी पहचान विद्यार्थियों के लिए आसान नहीं है। प्रवेश के नाम पर ये छात्रों से मोटी रकम वसूल लेते हैं और सब्जबाग दिखाकर उनके भविष्य से खिलवाड़ करते हैं। ऐसे कॉलेज स्वास्थ्य महकमे के लिए सिर दर्द बन गए हैं।
शहर में दो माह पूर्व मड़वानगर स्थित मां वैष्णो पैरामेडिकल कॉलेज तब विवादों में आया, जब यहां के विद्यार्थियों ने अपनी डिग्री को उत्तर प्रदेश स्टेट मेडिकल फैकल्टी में चेक कराया। जहां उन्हें बताया गया कि इस नाम का कोई भी कॉलेज उनके यहां पंजीकृत नहीं है, जो डिग्री मिली है, वह पूरी तरह फर्जी है। इसके बाद विद्यार्थियों ने जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक मामले की शिकायत की। जांच में यह कॉलेज फर्जी पाया गया। प्रशासन ने कॉलेज पर ताला जड़ दिया। इसकी के साथ ही संचालकों पर मुकदमा भी दर्ज हुआ। न्यायालय में हाजिर न होने पर संचालकों के खिलाफ अब कुर्की का नोटिस जारी हुआ है। इतना सब होने के बाद भी फर्जी ढंग से संचालित पैरामेडिकल कॉलेजों के संचालकों के हौसले बुलंद हैं। वे झूठ की बुनियाद पर अपना धंधा चमका रहे हैं।
विद्यार्थियों को इस तरह फंसाते हैं जाल में
फर्जी ढंग से संचालित पैरामेडिकल कॉलेजों के संचालक निकटवर्ती क्षेत्रों में खूब प्रचार-प्रसार करते हैं। इस तरह का माहौल बनाते हैं कि कोई भी आसानी से इनपर भरोसा कर ले। कुछ लोगों को तो ये प्रचार के लिए रकम भी देते हैं, जो छात्रों के घरों में पहुंचकर उनके परिजनों को कॉलेज की विशेषता और 100 प्रतिशत प्लेसमेंट की गारंटी देते हैं।
जिले में पंजीकृत हैं 14 पैरामेडिकल कॉलेज
डिप्टी सीएमओ सीएल कनौजिया कहते हैं जिले में 14 पैरामेडिकल कॉलेज पंजीकृत हैं। बताते हैं कि दो कॉलेजों की शिकायत उन्हें मिली है। इसकी जांच की जा रही है। विभाग भी समय-समय पर अभियान चलाकर जांच करता है।
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77 हजार में 10 हजार 585 को मिले गोल्डेन कॉर्ड
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। आयुष्मान भारत योजना का लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की ओर से हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन जिले में यह योजना ठीक ढंग से लागू नहीं हो पा रही है। इसका मुख्य कारण यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बताई जा रही है। इसके चलते मरीजों को महानगरों की ओर रुख करना पड़ता है।
आयुष्मान भारत योजना शुरू हुए कई महीने बीत गए लेकिन अभी तक जिले में सिर्फ 835 लोगों ने ही इस योजना का लाभ लिया है, जबकि एक लाख 69 हजार परिवारों को इस योजना के तहत लाभ दिए जाने का लक्ष्य है। यही नहीं, ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिनके नाम सूची में गलत दर्ज हो गए हैं और अब उन्हें नाम सही कराने के लिए स्वास्थ्य महकमे का चक्कर लगाना पड़ रहा है। बहुत से पात्र ऐसे हैं, जिनके मोबाइल नंबर ही बदल गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में 77 हजार पात्र लोगों को गोल्डन कार्ड वितरित किया जाना है। इनमें से अब तक 10 हजार 585 लोगों को गोल्डन कार्ड दिए गए हैं। सीएमओ जेएलएम कुशवाहा का कहना है कि पात्रों को योजना का लाभ मिले, इसके लिए विभाग की ओर से हर संभव कोशिश की जा रही है।
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इलाज के लिए 17 अस्पताल चिह्नित
आयुष्मान भारत योजना का लाभ अधिक से अधिक लोगों को मिल सके। इसके लिए जिले में 17 अस्पताल चिह्नित हैं। इनमें तीन सरकारी अस्पताल भी शामिल हैं। चिह्नित अस्पतालों में जिला अस्पताल, जिला महिला चिकित्सालय, ओपेके चिकित्सालय कैली, संतकबीर आई हास्पिटल, नवयुग मेडिकल सेंटर, श्री कृष्णा मिशन हास्पिटल, ज्यान हास्पिटल, पूर हास्पिटल, खैर मेमोरियल हास्पिटल, पीएमसी हॉस्पिटल, बस्ती ट्रॉमा सेंटर, एसआर हॅास्पिटल, तथास्तु इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, जेजे हॉस्पिटल, अकक्ष्य हॉस्पिटल, अयोध्या आई हॅास्पिटल, बस्ती केयर सेंटर आदि शामिल हैं।
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जिला अस्पताल में घूम रहे स्वाइन फ्लू के वाहक
वर्ष 2019 में स्वाइन फ्लू का पहला मरीज मिला
वर्ष 2017 में जिले में स्वाइन फ्लू से हुई तीन मौतें
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। स्वाइन फ्लू को लेकर सरकार गंभीर है और इसकी रोकथाम के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जिला अस्पताल में इस बीमारी को लेकर कोई एहतियात नहीं बरती जा रही है। अस्पताल परिसर में बेरोक यहां स्वाइन फ्लू के वाहक घूम रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अस्पताल प्रशासन इससे बेखबर है।
वर्ष 2019 में तीन फरवरी तक देश में स्वाइन फ्लू के कुल 6701 मामले सामने आए हैं, जिसके चलते अब तक 226 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद भी जिला चिकित्सालय इस बीमारी को लेकर गंभीर नहीं हुआ है। अस्पताल परिसर में मेन गेट से घुसते ही दाहिनी साइड में कूड़े का ढेर लगा हुआ है, यह साधारण कूड़ा नहीं है। यह बायोवेस्ट है, जिसमें इस्तेमाल की हुई सुई, रूई, पट्टी व दवाओं के डिब्बे आदि शामिल हैं। इनसे उठती दुर्गंध के चलते इस ओर से गुजरना कोई मुनासिब नहीं समझता। जहां यह कूड़े पड़े हैं। ठीक उसी के पीछे डॉक्टरों की कॉलोनी है और कुष्ठ रोग निदान केंद्र भी स्थापित है। कूड़े के ढेर में स्वाइन फ्लू के वाहक यानी की सुअरों की तादाद आपको दिख जाएगी। ये सुअर बेरोक अस्पताल परिसर में घूम रहे हैं। इसके चलते लोगों में स्वाइन फ्लू का खतरा भी बना हुआ है।
जिले में मिला स्वाइन फ्लू का मरीज
सोमवार को जिले में स्वाइन फ्लू का मरीज मिलने से स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। वर्ष 2019 में यह पहला मामला है। शहर के महरीखांवा निवासी अजय चौधरी को इंफ्लूएंजा एच 1 एच 1 पाजिटिव पाया गया है। चौधरी का इलाज लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में चल रहा है। वर्ष 2017 में जिले में 13 मरीज स्वाइन फ्लू से पीड़ित मिले थे। इनमें से तीन की मौत हो गई थी। मृतकों में एक नगरीय क्षेत्र का तथा दो ग्रामीण क्षेत्र के थे। वर्ष 2018 में कोई भी मामला सामने नहीं आया था।
अधिकारी की सुनिए
प्रभारी एसआईसी डॉ वीके मिश्रा कहते हैं कि अस्पताल में साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है, सुअर घूमने की बात पर कहा कि इसे लेकर मुझे कोई जानकारी नहीं।
स्वास्थ्य महकमे के लिए सिर दर्द बने पैरामेडिकल कॉलेज
दो पैरामेडिकल कॉलेजों की चल रही जांच
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। जिले में पैरामेडिकल कॉलेजों की भरमार है। कौन रजिस्टर्ड है और कौन फर्जी। इसकी पहचान विद्यार्थियों के लिए आसान नहीं है। प्रवेश के नाम पर ये छात्रों से मोटी रकम वसूल लेते हैं और सब्जबाग दिखाकर उनके भविष्य से खिलवाड़ करते हैं। ऐसे कॉलेज स्वास्थ्य महकमे के लिए सिर दर्द बन गए हैं।
शहर में दो माह पूर्व मड़वानगर स्थित मां वैष्णो पैरामेडिकल कॉलेज तब विवादों में आया, जब यहां के विद्यार्थियों ने अपनी डिग्री को उत्तर प्रदेश स्टेट मेडिकल फैकल्टी में चेक कराया। जहां उन्हें बताया गया कि इस नाम का कोई भी कॉलेज उनके यहां पंजीकृत नहीं है, जो डिग्री मिली है, वह पूरी तरह फर्जी है। इसके बाद विद्यार्थियों ने जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक मामले की शिकायत की। जांच में यह कॉलेज फर्जी पाया गया। प्रशासन ने कॉलेज पर ताला जड़ दिया। इसकी के साथ ही संचालकों पर मुकदमा भी दर्ज हुआ। न्यायालय में हाजिर न होने पर संचालकों के खिलाफ अब कुर्की का नोटिस जारी हुआ है। इतना सब होने के बाद भी फर्जी ढंग से संचालित पैरामेडिकल कॉलेजों के संचालकों के हौसले बुलंद हैं। वे झूठ की बुनियाद पर अपना धंधा चमका रहे हैं।
विद्यार्थियों को इस तरह फंसाते हैं जाल में
फर्जी ढंग से संचालित पैरामेडिकल कॉलेजों के संचालक निकटवर्ती क्षेत्रों में खूब प्रचार-प्रसार करते हैं। इस तरह का माहौल बनाते हैं कि कोई भी आसानी से इनपर भरोसा कर ले। कुछ लोगों को तो ये प्रचार के लिए रकम भी देते हैं, जो छात्रों के घरों में पहुंचकर उनके परिजनों को कॉलेज की विशेषता और 100 प्रतिशत प्लेसमेंट की गारंटी देते हैं।
जिले में पंजीकृत हैं 14 पैरामेडिकल कॉलेज
डिप्टी सीएमओ सीएल कनौजिया कहते हैं जिले में 14 पैरामेडिकल कॉलेज पंजीकृत हैं। बताते हैं कि दो कॉलेजों की शिकायत उन्हें मिली है। इसकी जांच की जा रही है। विभाग भी समय-समय पर अभियान चलाकर जांच करता है।