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दीन और इल्म का खजाना थे आला हजरत : मुफ्ती मोहम्मद मुजीब
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Wed, 15 Nov 2017 01:06 AM IST
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इलेक्ट्रिक लाइटों से सजाई गई नूरी मस्जिद।
- फोटो : Amar Ujala
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आला हजरत इमाम अहमद रजा खां अलैहिर्रहमां दीन और इल्म का खजाना थे। सिर्फ 13 वर्ष की आयु में मुफ्ती बन गए। उन्होंने इस्लाम, साइंस, अर्थव्यवस्था आदि विषयों पर एक हजार से ज्यादा किताबें लिखीं। उनको 55 से ज्यादा विषयों पर महारत हासिल थी। उनका एक प्रमुख ग्रंथ ‘फतावा रजविया’ है। 30 हिस्सों में बंटा यह ग्रंथ का विषय इस्लामी कानून है। उनका उर्दू जुबान में किया गया कुरआन का तर्जुमा ‘कन्जुल ईमान’ विश्वविख्यात हैं। उलेमा-ए-अरब व अजम सबने आप की इल्मी लियाकत को तस्लीम किया।
ये बातें नागपुर से आए मुफ्ती मोहम्मद मुजीब अशरफ ने तुर्कमानपुर में मंगलवार को 99वां उर्स-ए-आला हजरत जलसे में कहीं। मेंहदावल के मुफ्ती अलाउद्दीन मिस्बाही ने कहा कि आला हजरत ने इस्लाम और सुन्नत की सही तफसीर पेश की। इससे पूरी दुनिया में आला हजरत को इस्लाम के सच्चे आलिम-ए-दीन के तौर पर जाना गया। उन्होंने बदअकीदगी व गुमराही के तूफान को रोका और करोड़ों मुसलामानों का ईमान बचाया। विशिष्ट अतिथि घोसी के इस्लामिक विद्वान मौलाना इफ़्तेखार नदीम ने कहा कि आला हजरत की जिंदगी का हर गोसा कुरआन और सुन्नत पर अमल करने व सुन्नियत को जिंदा करने में गुजरा।
नात शरीफ गुजरात के गुलाम मुस्तफा, घोसी के गुलाम रसूल और किछौछा शरीफ के सोहराब कादरी ने पेश की। सरपरस्ती मौलाना हबीबुर्रहमान और सदारत मौलाना मकबूल अहमद की रही। संचालन मौलाना इश्तियाक अहमद ने किया। इस दौरान मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी की किताब ‘रसूलल्लाह की बशारत, सहाबा किराम की शहादत’ का विमोचन भी हुआ। अंत में सलातो सलाम पेश कर कौम-ओ-मुल्क के लिए दुआएं मांगी गईं। जलसे में शाबान अहमद, अलाउद्दीन निजामी, मौलाना असलम रज़वी, मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहरी, मुफ्ती मो. अजहर शम्सी, मो. मोहसिन, जहांगीर अजीजी, अफ जल बरकाती, मनौव्वर अहमद, सेराज अहमद, कारी अंसारुल हक, हाफिज रहमत अली, सैफ आदि मौजूद रहे।
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कुल शरीफ के साथ आज होगा उर्स का समापन
आला हजरत इमाम अहमद रजा खां के उर्स-ए-पाक का समापन बुधवार को कुल शरीफ की रस्म से होगा। संयोजक अलाउद्दीन निजामी ने बताया कि नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में सुबह फज्र की नमाज के बाद कुरआन ख्वानी होगी व दोपहर 2:38 बजे नूरी मस्जिद में कुल शरीफ की रस्म अदा की जाएगी। इसके बाद लंगर तकसीम किया जाएगा। वहीं मदरसा दारूल उलूम अहले सुन्नत मजहरूल उलूम घोसीपुरवा में प्रात: 9:00 बजे, दीवान बाजार स्थित मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया में 10:00 बजे व नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद में सुबह 6:00 बजे आला हजरत का उर्स मनाया जाएगा।
आला हजरत के छोटे साहबजादे ने रखी थी नूरी मस्जिद की नींव
शहर में आला हजरत के उर्स-ए-पाक को पूरी शिद्दत से मनाए जाने की सिलसिला करीब 40 साल से चला आ रहा है। 1978 में गोरखपुर का बरेली की आला हजरत दरगाह से वो रिश्ता कायम हुआ, जिसने यहां इस परंपरा की बुनियाद रखी। आला हजरत के छोटे साहबजादे तब गोरखपुर के तुर्कमानपुर मोहल्ले में अपने मुरीद शेख बरकतुल्लाह नूरी के यहां मेहमान बनकर आए थे। यहीं पास में उन्होंने एक मस्जिद की नींव रखी जो आज नूरी मस्जिद के नाम से जानी जाती है।
अब जन्नतनशीं हो चुके शेख बरकतुल्लाह नूरी के छोटे बेटे शाबान अहमद बताते हैं कि वालिद आला हजरत के छोटे साहबजादे मुफ्ती-ए-आजम हिंद मुस्तफा रजा खां के मुरीद थे। उनके बुलावे पर वो 1978 में घर आए थे। उन्होंने तब अब्बू की गुजारिश पर यहां एक मस्जिद की बुनियाद रखी। इसके बाद यहां भी आला हजरत का उर्स-ए-पाक मनाने की परंपरा कायम हुई। यह सिलसिला आज भी कायम है। शेख बरकतुल्लाह के नाती अलाउद्दीन निजामी ने बताया कि मुफ्ती-ए-आजम हिंद मुस्तफा रजा खां आला हजरत के छोटे बेटे थे। उनके बड़े भाई हामिद रजा खां रहे। गोरखपुर आगमन के तीन साल बाद 1981 में मुस्तफा रजा खां जन्नतनशीं हो गए, लेकिन शहर में आज भी बड़ी संख्या में उनके मुरीद मौजूद हैं। हर साल हम लोग आला हजरत के उर्स पर दो दिनी कार्यक्रम करते हैं। बुधवार को नूरी मस्जिद में कुल शरीफ की रस्म के बाद लंगर तकसीम कराकर उर्स-ए-पाक का समापन होगा।
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ये बातें नागपुर से आए मुफ्ती मोहम्मद मुजीब अशरफ ने तुर्कमानपुर में मंगलवार को 99वां उर्स-ए-आला हजरत जलसे में कहीं। मेंहदावल के मुफ्ती अलाउद्दीन मिस्बाही ने कहा कि आला हजरत ने इस्लाम और सुन्नत की सही तफसीर पेश की। इससे पूरी दुनिया में आला हजरत को इस्लाम के सच्चे आलिम-ए-दीन के तौर पर जाना गया। उन्होंने बदअकीदगी व गुमराही के तूफान को रोका और करोड़ों मुसलामानों का ईमान बचाया। विशिष्ट अतिथि घोसी के इस्लामिक विद्वान मौलाना इफ़्तेखार नदीम ने कहा कि आला हजरत की जिंदगी का हर गोसा कुरआन और सुन्नत पर अमल करने व सुन्नियत को जिंदा करने में गुजरा।
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नात शरीफ गुजरात के गुलाम मुस्तफा, घोसी के गुलाम रसूल और किछौछा शरीफ के सोहराब कादरी ने पेश की। सरपरस्ती मौलाना हबीबुर्रहमान और सदारत मौलाना मकबूल अहमद की रही। संचालन मौलाना इश्तियाक अहमद ने किया। इस दौरान मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी की किताब ‘रसूलल्लाह की बशारत, सहाबा किराम की शहादत’ का विमोचन भी हुआ। अंत में सलातो सलाम पेश कर कौम-ओ-मुल्क के लिए दुआएं मांगी गईं। जलसे में शाबान अहमद, अलाउद्दीन निजामी, मौलाना असलम रज़वी, मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहरी, मुफ्ती मो. अजहर शम्सी, मो. मोहसिन, जहांगीर अजीजी, अफ जल बरकाती, मनौव्वर अहमद, सेराज अहमद, कारी अंसारुल हक, हाफिज रहमत अली, सैफ आदि मौजूद रहे।
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कुल शरीफ के साथ आज होगा उर्स का समापन
आला हजरत इमाम अहमद रजा खां के उर्स-ए-पाक का समापन बुधवार को कुल शरीफ की रस्म से होगा। संयोजक अलाउद्दीन निजामी ने बताया कि नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में सुबह फज्र की नमाज के बाद कुरआन ख्वानी होगी व दोपहर 2:38 बजे नूरी मस्जिद में कुल शरीफ की रस्म अदा की जाएगी। इसके बाद लंगर तकसीम किया जाएगा। वहीं मदरसा दारूल उलूम अहले सुन्नत मजहरूल उलूम घोसीपुरवा में प्रात: 9:00 बजे, दीवान बाजार स्थित मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया में 10:00 बजे व नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद में सुबह 6:00 बजे आला हजरत का उर्स मनाया जाएगा।
आला हजरत के छोटे साहबजादे ने रखी थी नूरी मस्जिद की नींव
शहर में आला हजरत के उर्स-ए-पाक को पूरी शिद्दत से मनाए जाने की सिलसिला करीब 40 साल से चला आ रहा है। 1978 में गोरखपुर का बरेली की आला हजरत दरगाह से वो रिश्ता कायम हुआ, जिसने यहां इस परंपरा की बुनियाद रखी। आला हजरत के छोटे साहबजादे तब गोरखपुर के तुर्कमानपुर मोहल्ले में अपने मुरीद शेख बरकतुल्लाह नूरी के यहां मेहमान बनकर आए थे। यहीं पास में उन्होंने एक मस्जिद की नींव रखी जो आज नूरी मस्जिद के नाम से जानी जाती है।
अब जन्नतनशीं हो चुके शेख बरकतुल्लाह नूरी के छोटे बेटे शाबान अहमद बताते हैं कि वालिद आला हजरत के छोटे साहबजादे मुफ्ती-ए-आजम हिंद मुस्तफा रजा खां के मुरीद थे। उनके बुलावे पर वो 1978 में घर आए थे। उन्होंने तब अब्बू की गुजारिश पर यहां एक मस्जिद की बुनियाद रखी। इसके बाद यहां भी आला हजरत का उर्स-ए-पाक मनाने की परंपरा कायम हुई। यह सिलसिला आज भी कायम है। शेख बरकतुल्लाह के नाती अलाउद्दीन निजामी ने बताया कि मुफ्ती-ए-आजम हिंद मुस्तफा रजा खां आला हजरत के छोटे बेटे थे। उनके बड़े भाई हामिद रजा खां रहे। गोरखपुर आगमन के तीन साल बाद 1981 में मुस्तफा रजा खां जन्नतनशीं हो गए, लेकिन शहर में आज भी बड़ी संख्या में उनके मुरीद मौजूद हैं। हर साल हम लोग आला हजरत के उर्स पर दो दिनी कार्यक्रम करते हैं। बुधवार को नूरी मस्जिद में कुल शरीफ की रस्म के बाद लंगर तकसीम कराकर उर्स-ए-पाक का समापन होगा।