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मृत्यु पर जय से मोक्ष तक का सहज पथ
Thu, 10 Jan 2019 01:18 AM IST
ajay Kumar
Gorakhpur, Uttar Pradesh, India
Gorakhpur, Uttar Pradesh, India
Published by: ajay Kumar
Updated Thu, 10 Jan 2019 01:18 AM IST
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gorakhnath temple
- फोटो : gorakhnath temple
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गोरखपुर। मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य ‘मोक्ष’ अर्थात् ‘जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति’ है। यह भारतीय सनातन दृष्टि है। यहां की सभी प्रमुख पांथिक-धाराओं एवं विचार-दर्शनों ने ‘मोक्ष’ प्राप्त करने के मार्ग सुझाए हैं। खिचड़ी मेले का स्थान गोरखनाथ मंदिर, उस महायोगी की तपस्थली है जिसने पूर्व मध्ययुगीन भारत के आध्यात्मिक जगत को अंधेरे से उबारा। धर्माचार्य आडंबरों की दीवार उठा रहे थे, उपासना पद्धतियां जटिल और जनसामान्य से दूर हो रही थीं। तब महायोगी गोरखनाथ ने नाथपंथ के रूप में वह मार्ग दिखाया जो साधक और आमजन दोनों ही के लिए सरल था। इस पर चलकर मृत्यु पर विजय और मोक्ष तक पहुंचना संभव हुआ।
सांसारिक जीवन में सामान्यतया सुख-संपत्ति तथा पद-प्रतिष्ठा की कामना ही बड़ी होती है पर अन्तत: जीवन के अंतिम सोपान पर पहुंच कर यही ‘मोक्ष’ की प्रार्थना में बदल जाती है। इस तरह देखें तो साधु-संत, योगी, ज्ञानी, अज्ञानी, गृहस्थ सभी को अन्तत: ‘मोक्ष’ का अमृत घट ही चाहिए। अदृश्य परलोक की इसी यात्रा के लिए देवी-देवाओं को प्रसन्न करने के नाम पर उपासना पद्धतियों में पाखंड-आडंबर घोले गए। उपासना के हक तक से वंचित किए गए ‘अछूत’ समाज को मोक्ष का अधिकारी ही नहीं माना गया। किंतु महायोगी गोरखनाथ का ‘योग’ सभी के लिए, समान रूप से, ऐहिक-पारलौकिक दोनों ही जीवन पर विजय पाने के मार्ग के रूप में सामने आया।
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(लेखक एमपीपीजी कॉलेज, जंगल धूसड़ के प्राचार्य हैं)
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सांसारिक जीवन में सामान्यतया सुख-संपत्ति तथा पद-प्रतिष्ठा की कामना ही बड़ी होती है पर अन्तत: जीवन के अंतिम सोपान पर पहुंच कर यही ‘मोक्ष’ की प्रार्थना में बदल जाती है। इस तरह देखें तो साधु-संत, योगी, ज्ञानी, अज्ञानी, गृहस्थ सभी को अन्तत: ‘मोक्ष’ का अमृत घट ही चाहिए। अदृश्य परलोक की इसी यात्रा के लिए देवी-देवाओं को प्रसन्न करने के नाम पर उपासना पद्धतियों में पाखंड-आडंबर घोले गए। उपासना के हक तक से वंचित किए गए ‘अछूत’ समाज को मोक्ष का अधिकारी ही नहीं माना गया। किंतु महायोगी गोरखनाथ का ‘योग’ सभी के लिए, समान रूप से, ऐहिक-पारलौकिक दोनों ही जीवन पर विजय पाने के मार्ग के रूप में सामने आया।
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योग बिना मोक्ष संभव ही नहीं
गोरक्ष सिद्धांत संग्रह में गुरु गोरखनाथ कहते हैं, काम, क्रोध, भय और चिंता से मुक्त होने की अवधि तक जीव को शिवत्व यानी मोक्ष प्राप्त नहीं होता। केवल ज्ञान से भी सिद्धि नहीं पाई जा सकती। काम-क्रोधादि विषयजनित प्रवृत्तियों पर विजय योग से ही संभव है। ‘योगबीज’ में शिव-पार्वती के संवाद का उल्लेख मिलता है। इसमें भगवान शिव बताते हैं कि संसारभ्रम के कारण अज्ञानी संसारीजीव मोह तो ज्ञानी अपने ज्ञान-संसार की वासना में लिप्त हो जाता है। इसलिए योग के बिना ज्ञानी, विरक्त, धर्मज्ञ, इन्द्रियजयी की भी मुक्ति संभव नहीं है।
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योगदेहधारी ही मोक्ष अधिकारी
नाथपंथी दर्शन बताता है कि योगाग्नि के बिना मुक्ति नहीं मिलने वाली। इसके बिना वैराग्य-जपादि व्यर्थ हैं। सप्तधातुमय देह को योगाग्नि में तपा कर योगदेह पाने वाला ही मोक्ष का अधिकारी होता है। इससे पहले मानव योग में प्रवृत्त हो मुक्तिपथ का पथिक बनता है। योगपथ के राही का ज्ञान भी मुक्त होता है। काल अधीन हो जाता है। मृत्यु उसकी इच्छा पर निर्भर होती है। नाथपंथ यहां तक पहुंचने में मनुष्य जीवन की चार अवस्थाओं और चार प्रकार के योगियों का भी जिक्र करता है जिनमें आमजन से लेकर मृत्यु को जीतने वाले तक शामिल हैं।(लेखक एमपीपीजी कॉलेज, जंगल धूसड़ के प्राचार्य हैं)