जीवन और उसके पार, एक ही चाबी से खुले हर द्वार
गुरु गोरखनाथ ने पातंजल योग दर्शन को युगसम्मत बनाकर जीवंत योगाचार प्रस्तुत किया। बताया कि किसी भी देवी-देवता की उपासना के लिए योग-ध्यान का मार्ग ही पर्याप्त है। उन्होंने ‘समतत्व की प्रतिष्ठा की। यह ‘समतत्व’ ही परमतत्व, परासंवित, परब्रह्म, परमपद, परम शून्य, परशिव सभी रूपों में समाहित था। यह मार्ग तत्व-चिंतन से अधिक आनुभूतिक-व्यावहारिक सच्चाई, चारित्रिक निष्ठा एवं मानसिक निर्मलता पर आधारित था। इस तरह समाज को उपासना एवं धर्म का ऐसा सहज-सरल रूप मिला जिसे पाने के लिए न कहीं जाना था और न किसी से मांगना। बस, सदाचरण से सत-चित-आनंद को पाया जा सकता था। यहां किसी मध्यस्थ की भी जरूरत नहीं थी। हां, योगी बनने के लिए गुरु आवश्यक था किंतु गृहस्थों के लिए सदाचरण और योग की सहज विधियां ही पर्याप्त थीं।
सद्गुण ही असली पूजा
महायोगी ने सत्य, शील, दान और दया जैसे व्यावहारिक गुणों के जीवन में उतारने को ही पूजा माना। इसी के पालन का उन्होंने योगी से लेकर सामान्यजन को पालन करने का उपदेश किया। विश्वास दिलाया कि इसी से सुख-शांति मिलेगी और परमात्मा भी। गोरखवाणी में ऐसे उपदेश भरे पड़े हैं। अहंकार से बचने तथा धैर्य, शालीनता और स्थिरता का ‘गोरखवाणी’ का यह उपदेश देखिए-हबकि न बोलिबा ठबकि न चलिबा धीरे धारिबा पावं/गरब न करिबां सहजै रहिबा भणत गोरख रावं।
आम जीवन से मोक्ष तक
महायोगी गोरखनाथ ने सभी के लिए स्वयं के प्रयत्न से योग, योग के माध्यम से धर्म और फिर मुक्ति तक का मार्ग दिखाया। ऐसी उपासना पद्धति जिसमें विशेष भाषा या ज्ञान की जरूरत नहीं। सब कुछ जीवनचर्या का ही हिस्सा था। यह तन को स्वस्थ रखने वाला, मन को शांत-स्थिर करने वाला तथा चित्त को आनंद देने वाला था। इसी सहज मार्ग के कारण महायोगी ने भारत ही नहीं आस-पास के देशों के लोगों का दिल जीता। राजा से फकीर तक नाथपंथ की योगधारा में निमग्न हुए।