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फिर उजागर हुआ शिकारियों का संजाल
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 17 Jan 2016 01:18 AM IST
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पड़ोसी जिले फतेहपुर की सीमा पर शिकारियों के जाल में लकड़बग्घे के फंसने के बाद एक बार फिर वन्यजीवों का अवैध शिकार किए जाने की पुष्टि हुई है।
मालूम हो कि रिंद, पांडु, दक्षिणी नोन और यमुना नदियों के किनारे जहां-तहां बचे थोड़े जंगली इलाकों में हिरण, जंगली सुअर, भेड़िया, लकड़बग्घा, वनबिलाव, बिज्जू, अजगर, खरगोश, सियार और लोमड़ी जैसे वन्यजीव निवास करते हैं। कीमती खाल और मांस के लालच में शिकारी मौका पाते ही निशाना बना लेते हैं।
वन्यजीवों के शिकार पर प्रतिबंध के चलते चोरी-छिपे शिकार हो रहा है। शाम होते शिकारी जाल बांधते हैं, रात में भोजन की खोज में जाल में फंस जाते हैं। वन्यजीवों के साथ जलजीवों का शिकार तेजी से किया जा रहा है।
नदियों और जलाशयों से मछली पकड़ने की आड़ में शिकारी कछुआ, केकड़ा, मेढक और यमुना नदी में पाई जाने वाली डाल्फिन तक का शिकार कर रहे हैं।
यमुनातटवर्ती गावों के निवासियों ने बताया कि 20 साल पहले तक यमुना नदी में बड़ी संख्या में सूंस अथवा सुसुआर (डाल्फिन) पाई जाती थीं। स्थानीय शिकारियों ने धीरे-धीरे विलुप्त की श्रेणी में पहुंचा दिया है।
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मालूम हो कि रिंद, पांडु, दक्षिणी नोन और यमुना नदियों के किनारे जहां-तहां बचे थोड़े जंगली इलाकों में हिरण, जंगली सुअर, भेड़िया, लकड़बग्घा, वनबिलाव, बिज्जू, अजगर, खरगोश, सियार और लोमड़ी जैसे वन्यजीव निवास करते हैं। कीमती खाल और मांस के लालच में शिकारी मौका पाते ही निशाना बना लेते हैं।
वन्यजीवों के शिकार पर प्रतिबंध के चलते चोरी-छिपे शिकार हो रहा है। शाम होते शिकारी जाल बांधते हैं, रात में भोजन की खोज में जाल में फंस जाते हैं। वन्यजीवों के साथ जलजीवों का शिकार तेजी से किया जा रहा है।
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नदियों और जलाशयों से मछली पकड़ने की आड़ में शिकारी कछुआ, केकड़ा, मेढक और यमुना नदी में पाई जाने वाली डाल्फिन तक का शिकार कर रहे हैं।
यमुनातटवर्ती गावों के निवासियों ने बताया कि 20 साल पहले तक यमुना नदी में बड़ी संख्या में सूंस अथवा सुसुआर (डाल्फिन) पाई जाती थीं। स्थानीय शिकारियों ने धीरे-धीरे विलुप्त की श्रेणी में पहुंचा दिया है।
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