{"_id":"622503df0422b97c7001f858","slug":"if-someone-took-a-loan-then-someone-spent-the-money-of-the-fund-faizabad-news-lko6206706176","type":"story","status":"publish","title_hn":"किसी ने लोन लिया तो किसी ने खर्च किए फंड के पैसे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
किसी ने लोन लिया तो किसी ने खर्च किए फंड के पैसे
विज्ञापन
अयोध्या। यूक्रेन व रूस की छिड़ी जंग के बीच यूक्रेन में फंसे अयोध्या के छात्रों के सकुुशल वापस आने पर जहां एक तरफ खुशी का माहौल तो है लेकिन दूूसरी तरफ परिजन उनके भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
चिंतित हों भी क्यों न किसी ने बैंक से लोन लेकर तो किसी ने अपने फंड के पैसों से अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए विदेश भेजा था, लेकिन युद्ध ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है। परिजनों को अब अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता है।
रिकाबगंज निवासी आशुतोष गुप्ता इस बात से खुश हैं कि उनके बच्चे पुत्र त्रिशूल गुप्ता व भतीजा जयंत गुप्ता सकुुशल घर वापसी कर रहे हैं, लेकिन बच्चों के भविष्य को लेकर उनके माथे पर चिंता की लकीरें हैं।
विज्ञापन
बताया कि बैंक से लोन लेकर बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजा था, अभी दोनों को डेढ़ साल का कोर्स बाकी है। आगे की पढ़ाई कैसे होगी अब इसकी चिंता सता रही है।
मंतराम वर्मा का पुत्र सुभाष वर्मा भी सकुशल यूक्रेन से अयोध्या पहुंच गया है। सुभाष के भाई अमरजीत वर्मा बताते हैं कि हमारी जीविका खेती-किसानी है। गन्ने की फसल बेचने से जो आय होती है वह सब भाई की मेडिकल की शिक्षा पूरी कराने के लिए लगा देते हैं।
अभी दो साल का कोर्स बाकी है। युद्ध की स्थिति में यूक्रेन वापस भेजने का सवाल ही नहीं है, भविष्य का क्या होगा इसको लेकर चिंता हो रही है। कहा किउम्मीद है कि भारत सरकार बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होने देगी।
मेडिकल विभाग से सेवानिवृत्त डॉ. अजय सिन्हा अपने बच्चे के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हैं। कहा कि मेडिकल शिक्षा के लिए विदेश भेजना मजबूरी होती है। विदेश में छह साल का कोर्स होता है। तकरीबन 40 से 45 लाख खर्च होते हैं।
भारत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक करोड़ से अधिक की जरूरत होती है। सेवानिवृत्त होने के बाद जीपीएफ को जो भी पैसा था सब बच्चे को डॉक्टर बनाने के लिए लगा दिया। अब तक करीब 30 लाख लग चुके हैं।
अभी उसका एक साल का कोर्स बाकी है, मेडिकल कांउसिल को बच्चों के हित में कोई निर्णय लेना चाहिए। चाहे देेश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में या फिर दूसरे किसी देश में बच्चों की शिक्षा पूरी कराई जाए ताकि उनका भविष्य बर्बाद होने से बच जाए।
विज्ञापन
चिंतित हों भी क्यों न किसी ने बैंक से लोन लेकर तो किसी ने अपने फंड के पैसों से अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए विदेश भेजा था, लेकिन युद्ध ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है। परिजनों को अब अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता है।
विज्ञापन
रिकाबगंज निवासी आशुतोष गुप्ता इस बात से खुश हैं कि उनके बच्चे पुत्र त्रिशूल गुप्ता व भतीजा जयंत गुप्ता सकुुशल घर वापसी कर रहे हैं, लेकिन बच्चों के भविष्य को लेकर उनके माथे पर चिंता की लकीरें हैं।
विज्ञापन
बताया कि बैंक से लोन लेकर बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजा था, अभी दोनों को डेढ़ साल का कोर्स बाकी है। आगे की पढ़ाई कैसे होगी अब इसकी चिंता सता रही है।
मंतराम वर्मा का पुत्र सुभाष वर्मा भी सकुशल यूक्रेन से अयोध्या पहुंच गया है। सुभाष के भाई अमरजीत वर्मा बताते हैं कि हमारी जीविका खेती-किसानी है। गन्ने की फसल बेचने से जो आय होती है वह सब भाई की मेडिकल की शिक्षा पूरी कराने के लिए लगा देते हैं।
अभी दो साल का कोर्स बाकी है। युद्ध की स्थिति में यूक्रेन वापस भेजने का सवाल ही नहीं है, भविष्य का क्या होगा इसको लेकर चिंता हो रही है। कहा किउम्मीद है कि भारत सरकार बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होने देगी।
मेडिकल विभाग से सेवानिवृत्त डॉ. अजय सिन्हा अपने बच्चे के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हैं। कहा कि मेडिकल शिक्षा के लिए विदेश भेजना मजबूरी होती है। विदेश में छह साल का कोर्स होता है। तकरीबन 40 से 45 लाख खर्च होते हैं।
भारत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक करोड़ से अधिक की जरूरत होती है। सेवानिवृत्त होने के बाद जीपीएफ को जो भी पैसा था सब बच्चे को डॉक्टर बनाने के लिए लगा दिया। अब तक करीब 30 लाख लग चुके हैं।
अभी उसका एक साल का कोर्स बाकी है, मेडिकल कांउसिल को बच्चों के हित में कोई निर्णय लेना चाहिए। चाहे देेश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में या फिर दूसरे किसी देश में बच्चों की शिक्षा पूरी कराई जाए ताकि उनका भविष्य बर्बाद होने से बच जाए।