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देश को सृद्ध करने में आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृति समृद्धि आवश्यक-ब्रिगेडियर
Updated Thu, 15 Feb 2018 01:17 AM IST
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देश में बेहतर सड़क व यातायात प्रबंधन की जरूरत
फैजाबाद। सेना ही समाज के हर पक्ष को बेहतर करने में सक्षम नहीं होती। देश को समृद्ध करने के लिए आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि आवश्यक है। आज देश में आतंकवाद और नक्सलवाद से प्रभावित होकर जितनी घटनाएं हो रही हैं, उससे कई गुना ज्यादा मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं से हो रही है। हमें बेहतर सड़क एवं यातायात प्रबंधन की भी जरूरत है। यह बातें बुधवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में ‘भारत के समक्ष खतरे: आंतरिक एवं वाह्य’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि डोगरा रेजिमेंटल सेंटर के ब्रिगेडियर ज्ञानोदय ने कहीं।
उन्होंने कहा कि, रक्षा अध्ययन में सभी वर्ग के छात्रों को शामिल किया जाना चाहिए। तभी हम ठीक ढंग से सेना और समाज की स्थितियों में बेहतर सामंजस्य स्थापित कर पायेंगे। कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि प्रत्येक देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति से छूटा हुआ व्यक्ति वृक्ष के टूटे हुए पत्तों के समान होता है। सांस्कृतिक खतरे के नाते ही भारत देश, जिसकी साक्षरता 1757 में 95 प्रतिशत थी, आजादी के बाद 26 प्रतिशत पर पहुंच गयी। इसके पीछे एक मात्र वजह सांस्कृतिक विघटन ही मानी जाती है। उन्होंने फीनलैंड की गुरुकुल व्यवस्था की शिक्षा को विश्व की बेहतर शिक्षा व्यवस्था के रूप बताते हुए कहा कि, गुरुकुल व्यवस्था हमें सांस्कृतिक विरासत के रूप में मिली थी। जिसे आज हमने अनुपयोगी समझ कर छोड़ दिया। जबकि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व होना चाहिए। इस मौके पर विश्वविद्यालय की छात्राओं ने वंदेमातरम एवं सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। संगोष्ठी में साकेत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रदीप खरे, विधि विभाग के शिक्षक डॉ. अजय सिंह, डॉ. अनुराग मिश्र, डॉ. डीके वर्मा आदि मौजूद रहे।
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फैजाबाद। सेना ही समाज के हर पक्ष को बेहतर करने में सक्षम नहीं होती। देश को समृद्ध करने के लिए आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समृद्धि आवश्यक है। आज देश में आतंकवाद और नक्सलवाद से प्रभावित होकर जितनी घटनाएं हो रही हैं, उससे कई गुना ज्यादा मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं से हो रही है। हमें बेहतर सड़क एवं यातायात प्रबंधन की भी जरूरत है। यह बातें बुधवार को डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में ‘भारत के समक्ष खतरे: आंतरिक एवं वाह्य’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि डोगरा रेजिमेंटल सेंटर के ब्रिगेडियर ज्ञानोदय ने कहीं।
उन्होंने कहा कि, रक्षा अध्ययन में सभी वर्ग के छात्रों को शामिल किया जाना चाहिए। तभी हम ठीक ढंग से सेना और समाज की स्थितियों में बेहतर सामंजस्य स्थापित कर पायेंगे। कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि प्रत्येक देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। संस्कृति से छूटा हुआ व्यक्ति वृक्ष के टूटे हुए पत्तों के समान होता है। सांस्कृतिक खतरे के नाते ही भारत देश, जिसकी साक्षरता 1757 में 95 प्रतिशत थी, आजादी के बाद 26 प्रतिशत पर पहुंच गयी। इसके पीछे एक मात्र वजह सांस्कृतिक विघटन ही मानी जाती है। उन्होंने फीनलैंड की गुरुकुल व्यवस्था की शिक्षा को विश्व की बेहतर शिक्षा व्यवस्था के रूप बताते हुए कहा कि, गुरुकुल व्यवस्था हमें सांस्कृतिक विरासत के रूप में मिली थी। जिसे आज हमने अनुपयोगी समझ कर छोड़ दिया। जबकि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व होना चाहिए। इस मौके पर विश्वविद्यालय की छात्राओं ने वंदेमातरम एवं सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। संगोष्ठी में साकेत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रदीप खरे, विधि विभाग के शिक्षक डॉ. अजय सिंह, डॉ. अनुराग मिश्र, डॉ. डीके वर्मा आदि मौजूद रहे।
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