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यूपी-एमपी सरहद पर चल रही हैं ढाई सौ हीरा खदानें
अमर उजाला, बांदा
Updated Thu, 07 Nov 2013 08:19 AM IST
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बेशकीमती ‘हीरा’ तलाश कर दूसरों की जिंदगी को मालामाल कर देने वाले गोंड़ समुदाय के खदान मजदूर खुद बेहद तंगहाली और गरीबी से जूझ रहे हैं। दिनरात की ताबड़तोड़ मेहनत व मशक्कत के बाद ही इन आदिवासियों के घर चूल्हा जलता है।
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बांदा जनपद की सरहद से जुड़े पन्ना (मध्य प्रदेश) में सिंहपुर और कौहारी में पहाड़ों व घने जंगलों के बीच हीरा की लगभग ढाई सौ से ज्यादा खदानें हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार सहित कई प्रदेशों के ठेकेदार यहां आकर अपनी किस्मत आजमाते हैं।
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इन्हें अक्सर बहुमूल्य हीरा हाथ लगता है, लेकिन खदानों में हीरा तलाशने वाले आदिवासी महिला-पुरुष मजदूर बद्तर हालात में जीने को मजबूर हैं। मजदूरी इतनी कम मिलती है कि सिर्फ दो वक्त की रूखी-सूखी रोटी का ही जुगाड़ हो पाता है।
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सरकार की ओर से भी खदानों के इर्द-गिर्द सरकारी सुविधाएं नहीं मिलतीं। खदानों में काम करने वाले आदिवासी मजदूरों के मुताबिक जंगलों में बाहरी मजदूर काम करने नहीं आते। दिन-रात हाड़तोड़ मेहनत के बाद उन्हें मजदूरी सिर्फ 100 रुपये प्रतिदिन मिलती है। महिलाओं और किशोरियों को 50-50 रुपये मजदूरी दी जाती है।
कुछ गहरी खदानों में मजदूरों को दैनिक मजदूरी के बजाए टोकन दिए जाते हैं। 50 फीट तक गहरी खदान से मलबा ऊपर लाने में हर बार एक टोकन मिलता है। शाम को सारे टोकन इकट्ठा करके मजदूरी का भुगतान किया जाता है।
यह भी 100 रुपये से अधिक नहीं होता। खासकर महिला मजदूरों को भारी मशक्कत उठानी पड़ती है। मजदूरी बहुत कम है, लेकिन गरीबी ज्यादा होने से यह मेहनताना भी काफी लगता है। गोंड समुदाय में 80 फीसदी महिला-पुरुष अनपढ़ हैं।