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यूपी: शिक्षकों की भर्ती के 'खेल' में अफसर मालामाल

Fri, 26 Jul 2013 01:09 AM IST
शैलेंद्र श्रीवास्तव
शैलेंद्र श्रीवास्तव Updated Fri, 26 Jul 2013 01:09 AM IST
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corruption in teacher recruitment

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में माध्यमिक सेवा चयन आयोग का गठन इस मकसद से किया गया है कि सहायता प्राप्त स्कूलों में योग्य और अच्छे शिक्षक मिल सकें। पर राज्य सरकार के अधिकारी ही इस मकसद को सफल नहीं होने दे रहे हैं।

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यही वजह है कि माध्यमिक शिक्षा के एडेड स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती में लंबा खेल हो रहा है और मैनेजर से लेकर शिक्षा अधिकारी तक सब मालामाल हो रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में माध्यमिक शिक्षा विभाग कक्षा 9 से लेकर 12 तक की शिक्षा देता है। इसके लिए राजकीय इंटर कॉलेजों के अलावा सहायता प्राप्त स्कूल भी चल रहे हैं।
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प्रदेश में मौजूदा समय 4500 के करीब माध्यमिक शिक्षा परिषद से सहायता प्राप्त स्कूल संचालित हो रहे हैं। सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षक रखने के लिए वर्ष 1982 में माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड का गठन किया गया।
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आयोग के गठन के बाद से सहायता प्राप्त स्कूलों में प्रधानाचार्य और शिक्षकों की भर्ती का अधिकार इसे दे दिया गया है। इसके साथ ही 31 दिसंबर 2000 से सहायता प्राप्त स्कूलों में तदर्थ शिक्षकों की भर्ती पर रोक लगा दी गई है।

इसके बाद भी स्कूल मैनेजर और शिक्षा अधिकारी गुपचुप तरीके से विज्ञापन निकाल कर शिक्षकों की भर्ती कर लेते हैं। शिक्षकों की भर्ती के बाद इन्हें वेतन देने के लिए हाईकोर्ट से ऑर्डर प्राप्त कर लिया जाता है।

चूंकि इस भर्ती में शिक्षा विभाग के अधिकारियों से लेकर मैनेजर तक सभी शामिल होते हैं, इसलिए वेतन निकाल दिया जाता है। बताया जाता है कि सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है। इस रकम में सभी की हिस्सेदारी होती है।

कैसे होता है खेल
सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती के लिए एक रणनीति के तहत काम होता है। इसके लिए जिला विद्यालय निरीक्षक आफिस का बाबू सारी गोटियां बैठता है।

शिक्षक पद पर किसकी भर्ती की जाएगी, यह पहले से ही तय होता है। इसके बाद गुपचुप तरीके से भर्तियां कर ली जाती हैं। तीन-चार महीने तक वेतन नहीं निकल पाता है, लेकिन हाईकोर्ट से वेतन भुगतान का ऑर्डर प्राप्त कर भुगतान कर दिया जाता है।


कौन है तदर्थ शिक्षक

सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षकों के रिटायर होने के बाद उनके स्थान पर अस्थाई शिक्षक को रखा जाता था। इसे तदर्थ शिक्षक का नाम दिया गया। वर्ष 1974 और 1975 में यह व्यवस्था दी गई थी। इसके बाद इसे बंद कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 1982 के बाद से 31 दिसंबर 2000 तक तदर्थ शिक्षक रखने की व्यवस्था दी गई, लेकिन दिसंबर 2000 में इस पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

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