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Ayodhya News: खरीद के बाद भी कागजों पर दम तोड़ गया शोध कार्य
Wed, 08 Apr 2026 11:53 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Wed, 08 Apr 2026 11:53 PM IST
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अयोध्या। राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज के औषधि भंडार से सितंबर तक शैंपू और बॉडीवॉश की मांग होती रही। इसके बाद से एकाएक मांग पत्र आना बंद हो गया, जिससे रोगियों को इसका लाभ नहीं मिल सका। इस अवधि तक आए मांग पत्र की कुछ प्रतियां भी अमर उजाला के हाथ लगी हैं। इसके चलते ही करीब 20 लाख की खरीद के बावजूद शोध कार्य ने कागजों पर ही दम तोड़ दिया।
लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने वाले रोगियों को विभिन्न तरह के संक्रमण से बचाने के लिए कॉलेज प्रशासन ने मार्च, 2025 में ही शैंपू और बॉडीवॉश खरीदने की प्रक्रिया शुरू की थी। पहली बार जून, 2025 में दोनों सामानों की एक-एक खेप आई थी। इसके बाद से ही ट्रायल शुरू हुआ। इसके लिए अलग-अलग विभागों से इंडेंट आने लगा। मेडिसिन आईसीयू से अगस्त, 2025 में दो बार व सितंबर में एक बार इंडेंट आने के रिकॉर्ड मिले।
वहीं, लेबर रूम से सितंबर, 2025 में मांग पत्र भेजा गया था। न्यूरो सर्जरी के लगभग 15 मरीजों पर भी इनका प्रयोग किया गया। इस बीच अचानक से इन विभागों से इनकी मांग ठप हो गई। जबकि, चिकित्सकों के अनुसार रोगियों पर इनके उपयोग के बेहतर परिणाम सामने आए थे। इससे न तो शोध पूरा हो सका न ही इसका कोई फायदा रोगियों को मिल सका। इस दौरान हुई धन की बर्बादी को लेकर अब तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।
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g 20 लाख रुपये का नहीं हुआ भुगतान : इन सामग्री को लखनऊ की रैप्चुरस रिटेल्स इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड नामक फर्म ने आपूर्ति की थी। आपूर्ति किए गए सामानों का लगभग 20 लाख रुपये का भुगतान अब तक लंबित भी है। सूत्रों के अनुसार इसकी खरीद प्रक्रिया के दौरान इसे रोगी हित में आवश्यक बताया गया। प्राचार्य डॉ. दिनेश सिंह मर्तोलिया का कहना है कि अभी वह बाहर हैं। वापस लौटकर मामले की जानकारी के बाद इसकी जांच कराकर अग्रिम कार्रवाई तय की जाएगी।
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लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने वाले रोगियों को विभिन्न तरह के संक्रमण से बचाने के लिए कॉलेज प्रशासन ने मार्च, 2025 में ही शैंपू और बॉडीवॉश खरीदने की प्रक्रिया शुरू की थी। पहली बार जून, 2025 में दोनों सामानों की एक-एक खेप आई थी। इसके बाद से ही ट्रायल शुरू हुआ। इसके लिए अलग-अलग विभागों से इंडेंट आने लगा। मेडिसिन आईसीयू से अगस्त, 2025 में दो बार व सितंबर में एक बार इंडेंट आने के रिकॉर्ड मिले।
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वहीं, लेबर रूम से सितंबर, 2025 में मांग पत्र भेजा गया था। न्यूरो सर्जरी के लगभग 15 मरीजों पर भी इनका प्रयोग किया गया। इस बीच अचानक से इन विभागों से इनकी मांग ठप हो गई। जबकि, चिकित्सकों के अनुसार रोगियों पर इनके उपयोग के बेहतर परिणाम सामने आए थे। इससे न तो शोध पूरा हो सका न ही इसका कोई फायदा रोगियों को मिल सका। इस दौरान हुई धन की बर्बादी को लेकर अब तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।
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g 20 लाख रुपये का नहीं हुआ भुगतान : इन सामग्री को लखनऊ की रैप्चुरस रिटेल्स इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड नामक फर्म ने आपूर्ति की थी। आपूर्ति किए गए सामानों का लगभग 20 लाख रुपये का भुगतान अब तक लंबित भी है। सूत्रों के अनुसार इसकी खरीद प्रक्रिया के दौरान इसे रोगी हित में आवश्यक बताया गया। प्राचार्य डॉ. दिनेश सिंह मर्तोलिया का कहना है कि अभी वह बाहर हैं। वापस लौटकर मामले की जानकारी के बाद इसकी जांच कराकर अग्रिम कार्रवाई तय की जाएगी।