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दुनिया से जुड़े हैं, खुद से नहीं : राजनाथ
Tue, 06 Oct 2026 12:01 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Tue, 06 Oct 2026 12:01 AM IST
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22--सुरक्षा में चूक, फिर हंसी-ठिठोली--फोटो नीरज कुमार (अमर उजाला)--अयोध्या के रानोपाली स्थ
अयोध्या। रानोपाली के उदासीन ऋषि संगत आश्रम में सोमवार को बारिश की बूंदों के बीच संतों का समागम सजा था। देश के कोने-कोने से आए संत-महात्माओं और अयोध्या की संत परंपरा के प्रतिनिधियों से आश्रम परिसर भरा था। इसी आध्यात्मिक माहौल में गुरु पर्व महोत्सव के समापन समारोह और संत सम्मेलन को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती को आत्मबोध से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य दुनिया से तो जुड़ गया है, लेकिन खुद से नहीं जुड़ पाया है। यही आज का सबसे बड़ा संकट है।
राजनाथ सिंह ने कहा कि तकनीक ने दुनिया के ज्ञान को मनुष्य की मुट्ठी में ला दिया है। कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी हासिल की जा सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि उस ज्ञान को सही दिशा देने वाला विवेक हमारे भीतर कितना विकसित हुआ है। ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन उसके साथ विवेक और आत्मबोध का बढ़ना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के सामने आज भी वही मूल प्रश्न खड़े हैं मैं क्या हूं, मैं कौन हूं और मैं क्यों हूं? अपने आपको जानने की यह जिज्ञासा नई नहीं है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि इसी आत्मबोध की यात्रा में गुरु की भूमिका सामने आती है। गुरु केवल बाहरी दुनिया का ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं से परिचित कराने वाला होता है। तकनीक हमें सूचनाएं दे सकती है, लेकिन उन सूचनाओं का क्या करना है, यह विवेक ही तय करता है। उन्होंने संतों की भूमिका को भी इसी संदर्भ में रेखांकित किया। गुरु परंपरा की भूमिका समझाते हुए उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती के बाल्यकाल का प्रसंग सुनाया।
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उदासीन संतों ने राम मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
रक्षामंत्री ने कहा कि रानोपाली आश्रम, पंजाब के निहंग संतों और देशभर के उदासीन संतों ने राम मंदिर से जुड़े आंदोलनों और गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संतों ने केवल धर्म के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण में भी अहम योगदान दिया है। राजनाथ ने कहा कि भारतीय संस्कृति में संतों का स्थान अद्वितीय है। संत भारत के स्मृतिकार हैं।
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राजनाथ सिंह ने कहा कि तकनीक ने दुनिया के ज्ञान को मनुष्य की मुट्ठी में ला दिया है। कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी हासिल की जा सकती है, लेकिन असली सवाल यह है कि उस ज्ञान को सही दिशा देने वाला विवेक हमारे भीतर कितना विकसित हुआ है। ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन उसके साथ विवेक और आत्मबोध का बढ़ना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के सामने आज भी वही मूल प्रश्न खड़े हैं मैं क्या हूं, मैं कौन हूं और मैं क्यों हूं? अपने आपको जानने की यह जिज्ञासा नई नहीं है।
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रक्षा मंत्री ने कहा कि इसी आत्मबोध की यात्रा में गुरु की भूमिका सामने आती है। गुरु केवल बाहरी दुनिया का ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं से परिचित कराने वाला होता है। तकनीक हमें सूचनाएं दे सकती है, लेकिन उन सूचनाओं का क्या करना है, यह विवेक ही तय करता है। उन्होंने संतों की भूमिका को भी इसी संदर्भ में रेखांकित किया। गुरु परंपरा की भूमिका समझाते हुए उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती के बाल्यकाल का प्रसंग सुनाया।
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उदासीन संतों ने राम मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
रक्षामंत्री ने कहा कि रानोपाली आश्रम, पंजाब के निहंग संतों और देशभर के उदासीन संतों ने राम मंदिर से जुड़े आंदोलनों और गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संतों ने केवल धर्म के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण में भी अहम योगदान दिया है। राजनाथ ने कहा कि भारतीय संस्कृति में संतों का स्थान अद्वितीय है। संत भारत के स्मृतिकार हैं।