फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Colour, passion and devotion...the wonderful form of Holi of Awadh

Ayodhya News: रंग, राग और भक्ति...अवध की होली का अद्भुत स्वरूप

Sun, 01 Mar 2026 09:33 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Sun, 01 Mar 2026 09:33 PM IST
विज्ञापन
Colour, passion and devotion...the wonderful form of Holi of Awadh
01- लक्ष्मण किला में  फूलाें की होली खेलते संत-धर्माचार्य- संवाद
अयोध्या। अवध की धरती पर होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, लोकसंस्कृति और संगीत का अनुपम संगम है। रामनगरी में होली का उल्लास वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है। करीब 40 दिनों में रामनगरी के मठ-मंदिरों में होली गीतों की धुन गूंजती है। अवध की फिजाओं में इन दिनों रंग, राग और रामभक्ति का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा है। होली के पारंपरिक गीतों में केवल उत्सव का उल्लास नहीं, बल्कि आराध्य के प्रति प्रेम, समर्पण और आस्था की गहरी अभिव्यक्ति झलकती है।
विज्ञापन



रामनगरी में होली का आध्यात्मिक रंग बिखरता है। बात अवध के होली गीतों की हो तो यह गीत अवध का प्रतिनिधि होली गीत है- आजु अवध के अवध किशोर, सरयू जी के तीरे खेलें होली...। होली के एक अन्य प्रतिनिधि गीत केकरे हाथे कनक पिचकारी, केकरे हाथ अबीरा, अवध में होली खेलें रघुवीरा... में भी आराध्य से सरोकार प्रतिपादित है। होली गीतों में अवध की फिजा का भी सुंदर परिचय मिलता है, चढ़त फगुनवा बउर गए अमवा अउर महुआ, झूम-झूम गांवे सब मगन फगुआ...।
विज्ञापन




होली के बहाने सुदामा का कथानक भी गीतों में गुथा हुआ है... हेरें विकल सुदामा भुलाने, मोरा निज कै दइव रिसियाने...। ऐसे अनेक होली गीत महज कागजी नहीं हैं, बल्कि वसंत पंचमी पर होली की दस्तक के साथ मठ-मंदिरों में गायकों के गले की शान बनते हैं। पखावज सम्राट मरहूम पागलदास व अवधी घराने के दिग्गज प्रतिनिधि दिवंगत आचार्य गौरीशंकर ने होली गीतों को नया आयाम दिया। आचार्य रामकिशोरदास, पागलदास के शिष्य विजयरामदास एवं अजयरामदास जैसे कलाकार यूं तो अपनी शास्त्रीयता के लिए प्रसिद्ध हैं पर ठेठ अवधी की तान छेड़ने में भी महारत रखते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन




होली के रंग में घुली थी महंत सरयू शरण की साधना
मधुर उपासना परंपरा की प्रधानपीठ रंगमहल के संस्थापक रसिक संत सरयू शरण की साधना होली के रंग में किस कदर घुली थी, इसकी झलक उनके पदों में दिखती है। रंगीले रंगमहल खेल रहे दोउ फाग, सिय की चुनरी भीग गई, रामलला की पाग...। एक अन्य पद होली खेलन आए रघुराई, मलत गुलाल कपोलन ऊपर, दोउ दिस मारें तारी, होली खेलन आए रघुराई... में भी आचार्य का भाव प्रकट होता है। रंगमहल के महंत रामशरण दास बताते हैं कि होली का उल्लास मंदिर में 42 दिनों तक बिखरता है।


खेलत बसंत राजाधिराज...



महंत मिथिलेश नंदिनी शरण बताते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम होली के उल्लास से अधिक कमनीय दिखाई पड़ते हैं। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में खेलत बसंत राजाधिराज। देखत नभ कौतुक सुर समाज...एक पूरी परंपरा श्रीसीताराम के फाग-राग का विस्तार करती दिखाई पड़ती है। प्रख्यात रसिक संत रूपसखी के बिना अयोध्या की होली का जिक्र अधूरा रहेगा। रूपसखी की लिखित पद्यबद्ध होली प्रबंध का गान फाल्गुन शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक चुनिंदा मंदिरों में प्रमुख अनुष्ठान के रूप में होता है। रसिक परंपरा के संतों में होली की खुमारी इन पंक्तियों से भी अभिव्यक्त है, फागुन भागन चढ़ि चल्यो, अलिन बढ़्यो अनुराग, अब हिलमिल हम खेलिबौ, लली लाल संग फाग...।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed