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Ayodhya: प्राचीन रामायण पांडुलिपियों का राष्ट्रीय भंडार बनेगी रामनगरी, प्रधानमंत्री संग्रहालय ने मांगा आमंत्रण

Mon, 09 Mar 2026 06:12 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन मिश्र, अमर उजाला, अयोध्या
नितिन मिश्र, अमर उजाला, अयोध्या Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 09 Mar 2026 06:12 AM IST
सार

इसके तहत रामायण पांडुलिपियों का राष्ट्रीय भंडार स्थापित करने की योजना बनाई गई है। इसके लिए प्रधानमंत्री संग्रहालय की ओर से देशभर के विद्वानों, संस्थाओं और लोगों से प्राचीन रामायण पांडुलिपियों की जानकारी साझा करने का आमंत्रण दिया गया है।

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Ayodhya to become national repository of ancient Ramayana manuscripts
राम मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज, सांकेतिक... - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

देश भर में सुरक्षित प्राचीन रामायण की पांडु लिपियों को एक स्थान पर संजोने की बड़ी पहल शुरू होने जा रही है। इसके तहत रामायण पांडुलिपियों का राष्ट्रीय भंडार स्थापित करने की योजना बनाई गई है। इसके लिए प्रधानमंत्री संग्रहालय की ओर से देशभर के विद्वानों, संस्थाओं और लोगों से प्राचीन रामायण पांडुलिपियों की जानकारी साझा करने का आमंत्रण दिया गया है।

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जिन लोगों या संस्थाओं के पास प्राचीन और दुर्लभ रामायण की पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, उनसे संपर्क करने का आग्रह किया गया है, ताकि इन धरोहरों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण किया जा सके। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय व रामकथा संग्रहालय के निदेशक डॉ. संजीव सिंह की ओर प्रधानमंत्री संग्रहालय से यह आग्रह किया गया था कि देशभर से मिलने वाली रामायण पांडुलिपियों को अयोध्या में ही संरक्षित किया जाए, जिससे यह नगर रामायण परंपरा के वैश्विक अध्ययन का प्रमुख केंद्र बन सके। इस पर सहमति मिल गई है, अब इनका संरक्षण अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में करने की योजना है।
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संस्कृति मंत्रालय की ओर से जारी सूचना में बताया गया है कि संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी गई रामायण की पांडुलिपियां आमंत्रित की गई हैं। इनमें पारंपरिक भारतीय लिपियों जैसे ब्राह्मी, देवनागरी, ग्रंथा, सारदा, नंदीनागरी, बंगाली, ओड़िया, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल, गुजराती और मोदी लिपि में लिखित पांडुलिपियां शामिल हो सकती हैं। इन पांडुलिपियों में वाल्मीकि रामायण, क्षेत्रीय संस्करण, टीकाएं, उप-टीकाएं और ताड़पत्र या कागज पर लिखी सचित्र पांडुलिपियां भी शामिल की जा सकती हैं। इस पहल का उद्देश्य रामायण की कालातीत विरासत को सुरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।
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इच्छुक दाताओं से मांगी गई हैं यह जानकारियां
इच्छुक दाताओं से पांडुलिपि का शीर्षक, अनुमानित आयु, प्रयुक्त लिपि, भौतिक स्वरूप (कागज या ताड़पत्र), आकार और फोलियो संख्या जैसी जानकारी साझा करने का अनुरोध किया गया है। साथ ही प्रथम और अंतिम पृष्ठ के वीडियो नमूने व रंगीन तस्वीरें भेजने को प्राथमिकता दी गई है। पांडुलिपियां भेंट करने के इच्छुक लोग अयोध्या स्थित अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में संपर्क कर सकते हैं। यहां के निदेशक संजीव कुमार सिंह को डाक, फोन या ईमेल के माध्यम से जानकारी भेजी जा सकती है।


पांडुलिपियों की जांच के लिए समिति गठित
विज्ञापन प्रकाशित होने के तुरंत बाद से आग्रह आने लगे हैं। देश के कोने-कोने से लोग संपर्क कर रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि देशभर से कई दुर्लभ पांडुलिपियां सामने आएंगी, जो रामायण की परंपरा और इतिहास को और समृद्ध करेंगी। इन्हें एकत्र कर राष्ट्रीय भंडार के रूप में संरक्षित करने से शोध और अध्ययन को नई दिशा मिलेगी। जो सामग्री आएगी उसकी जांच के लिए पांच सदस्यीय कमेटी गठित की गई है। जिसमें केंद्रीय सांस्कृतिक विश्वविद्यालय के कुलपति, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के प्रबंधक, पांडुलिपि के जानकार दो प्रोफेसर शामिल हैं।
- डॉ. संजीव सिंह, निदेशक, अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय

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