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Amethi News: पितरों को याद कर श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान
Tue, 16 Sep 2025 01:09 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Tue, 16 Sep 2025 01:09 AM IST
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अमेठी में पितृपक्ष की नवमी पर पूर्वजों को पिंडदान करता युवक।-संवाद
अमेठी। पितृ पक्ष की नवमी श्राद्ध पर श्रद्धालुओं ने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान और तर्पण किया। प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के सरोवर और नदियों के तट पर सुबह से ही श्रद्धालु पहुंचकर पिंडदान, तर्पण और पूजा-पाठ में लीन रहे। श्रद्धालुओं ने प्रार्थना की कि उनके पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो और परिवार में सुख-शांति बनी रहे।
पितृ पक्ष की नवमी श्राद्ध पर सोमवार को जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण इलाकों से लोग पूर्वजों को स्मरण करने के लिए भोर में ही पवित्र जलस्रोतों की ओर निकल पड़े। रामगंज, तिलोई, जगदीशपुर, अमेठी व जिला मुख्यालय के साथ प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों के सरोवर और नदियों के घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ सुबह से ही जुटने लगी। नवमी श्राद्ध को पितरों की शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु पिंडदान और तर्पण करते हैं।
सुनील ओझा शास्त्री, आचार्य त्रिवेणी प्रसाद मिश्र ने बताया कि इस दिन किए गए श्राद्ध कर्म से कुल के दिवंगतजनों को तृप्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु अपने साथ तिल, कुश, गंगा जल, भोजन और मौसमी फल लेकर आए। श्राद्ध स्थल पर पंडितों की ओर से वेद मंत्रों का उच्चारण और विधिपूर्वक पितरों को अर्पण करने की प्रक्रिया पूरे दिन चलती रही। महिलाओं ने भी घरों में पूर्वजों के नाम पर व्यंजन बनाकर ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराया।
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बुजुर्ग राधेश्याम तिवारी, रामलखन पांडेय कहते हैं कि श्राद्ध कर्म न केवल पितरों की आत्मा की शांति, बल्कि परिवार में सद्भाव और संस्कारों के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। श्रद्धालु प्रवीण मिश्र ने कहा कि पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान करना पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर है। इस परंपरा से संस्कार और मूल्यों की भी याद बनी रहती है। आचार्य त्रिवेणी प्रसाद महाराज ने बताया कि सोमवार सुबह छह बजकर 27 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त होकर नवमी तिथि लग गई थी। इस कारण नवमी का ही श्राद्ध संपन्न हुआ।
गाय, कुत्तों और कौवों को दिया भोज
नवमी श्राद्ध मुख्य रूप से महिलाओं के लिए किया जाता है। इस दिन उन पुरुषों का भी श्राद्ध होता है, जिनकी मृत्यु नवमी तिथि को हुई। सोमवार को श्राद्ध व ब्राह्मणों को भोज कराने के बाद उन्हें वस्त्र और दक्षिणा देकर विदा किया गया। इसके पहले गाय, काला कुत्ता और कौवों को भी भोज दिया गया। ऐसी मान्यता है कि इन्हें भोज देने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे प्रसन्न होकर परिवार को खुशहाल बनाते हैं।
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पितृ पक्ष की नवमी श्राद्ध पर सोमवार को जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण इलाकों से लोग पूर्वजों को स्मरण करने के लिए भोर में ही पवित्र जलस्रोतों की ओर निकल पड़े। रामगंज, तिलोई, जगदीशपुर, अमेठी व जिला मुख्यालय के साथ प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों के सरोवर और नदियों के घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ सुबह से ही जुटने लगी। नवमी श्राद्ध को पितरों की शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु पिंडदान और तर्पण करते हैं।
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सुनील ओझा शास्त्री, आचार्य त्रिवेणी प्रसाद मिश्र ने बताया कि इस दिन किए गए श्राद्ध कर्म से कुल के दिवंगतजनों को तृप्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु अपने साथ तिल, कुश, गंगा जल, भोजन और मौसमी फल लेकर आए। श्राद्ध स्थल पर पंडितों की ओर से वेद मंत्रों का उच्चारण और विधिपूर्वक पितरों को अर्पण करने की प्रक्रिया पूरे दिन चलती रही। महिलाओं ने भी घरों में पूर्वजों के नाम पर व्यंजन बनाकर ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराया।
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बुजुर्ग राधेश्याम तिवारी, रामलखन पांडेय कहते हैं कि श्राद्ध कर्म न केवल पितरों की आत्मा की शांति, बल्कि परिवार में सद्भाव और संस्कारों के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। श्रद्धालु प्रवीण मिश्र ने कहा कि पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान करना पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर है। इस परंपरा से संस्कार और मूल्यों की भी याद बनी रहती है। आचार्य त्रिवेणी प्रसाद महाराज ने बताया कि सोमवार सुबह छह बजकर 27 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त होकर नवमी तिथि लग गई थी। इस कारण नवमी का ही श्राद्ध संपन्न हुआ।
गाय, कुत्तों और कौवों को दिया भोज
नवमी श्राद्ध मुख्य रूप से महिलाओं के लिए किया जाता है। इस दिन उन पुरुषों का भी श्राद्ध होता है, जिनकी मृत्यु नवमी तिथि को हुई। सोमवार को श्राद्ध व ब्राह्मणों को भोज कराने के बाद उन्हें वस्त्र और दक्षिणा देकर विदा किया गया। इसके पहले गाय, काला कुत्ता और कौवों को भी भोज दिया गया। ऐसी मान्यता है कि इन्हें भोज देने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे प्रसन्न होकर परिवार को खुशहाल बनाते हैं।