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‘कफन’ में सामंत के मुंशी बन गए प्रेमचंद
Lucknow
Updated Wed, 03 Apr 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं कथाकार प्रो. श्योराज सिंह बेचैन ने मुंशी प्रेमचंद के लेखन पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग प्रेमचंद को मार्क्सवादी कहते हैं। मार्क्स का पूरा दर्शन शोषित मजदूर के पक्ष में खड़ा है जबकि प्रेमचंद अपनी रचनाओं में जमीदारों और सामंतों की तरफदारी करते आए हैं।
प्रो. बेचैन मंगलवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में व्याख्यान दे रहे थे। इस दौरान शोध छात्र सुरेश कुमार ने उनकी आत्मकथा का जिक्र करते हुए कहा कि प्रेमचंद का सूरदास भीख मांगता है और आपकी आत्मकथा का सूरदास कमाकर खाता है। यह अंतर कैसे है? इसके जवाब में प्रो. बेचैन ने कहा कि दलितों में भीख मांगने की परंपरा नहीं है। प्रेमचंद की दलित विषयक सोच सूरदास तक ही सीमित नहीं है बल्कि ‘कफन’ के घीसू और माधव को प्रेमचंद कामचोर और आलसी बताते हैं। वहीं, उन्होंने जमींदार को उदार और कृपालु बताया है। ऐसे में जब उन्हें भूचोर जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए तो वह सामंत के मुंशी बन गए। डॉ. बेचैन ने हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत जताते हुए कहा कि इतिहास लिखने वाले जिन जातियों से आए थे, उनके सापेक्ष इतिहास लिख दिया गया। इसमें दलितों की रचनाशीलता को बाहर कर दिया गया। कार्यक्रम का संयोजन विभागाध्यक्ष प्रो. कालीचरण सनेही ने किया।
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प्रो. बेचैन मंगलवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में व्याख्यान दे रहे थे। इस दौरान शोध छात्र सुरेश कुमार ने उनकी आत्मकथा का जिक्र करते हुए कहा कि प्रेमचंद का सूरदास भीख मांगता है और आपकी आत्मकथा का सूरदास कमाकर खाता है। यह अंतर कैसे है? इसके जवाब में प्रो. बेचैन ने कहा कि दलितों में भीख मांगने की परंपरा नहीं है। प्रेमचंद की दलित विषयक सोच सूरदास तक ही सीमित नहीं है बल्कि ‘कफन’ के घीसू और माधव को प्रेमचंद कामचोर और आलसी बताते हैं। वहीं, उन्होंने जमींदार को उदार और कृपालु बताया है। ऐसे में जब उन्हें भूचोर जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए तो वह सामंत के मुंशी बन गए। डॉ. बेचैन ने हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत जताते हुए कहा कि इतिहास लिखने वाले जिन जातियों से आए थे, उनके सापेक्ष इतिहास लिख दिया गया। इसमें दलितों की रचनाशीलता को बाहर कर दिया गया। कार्यक्रम का संयोजन विभागाध्यक्ष प्रो. कालीचरण सनेही ने किया।
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