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मकड़ी के जालों से लगेंगे टांके, रेशम के तंतुओं से बनेंगी रक्त शिराएं
Lucknow
Updated Sun, 10 Mar 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। घरों के कोनों और पुरानी जगहों पर अक्सर मिलने वाले और बेकार समझे जाने वाले मकड़ी के जाले बेहतरीन बायो-मेडिकल मैटीरियल हैं। इतने बेहतरीन कि इनसे घावों पर टांके लगाए जा सकते हैं। वहीं एक कीड़े से मिलने वाले रेशम के तंतुओं का उपयोग कृत्रिम रक्त शिराएं बनाने में किया जा सकता है। केंद्रीय टसर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट रांची से आए वैज्ञानिकों ने शनिवार को एसजीपीजीआई मेडिकल साइंसेज लखनऊ में बायोलाइफ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी। इस दौरान देश भर के वैज्ञानिकों ने विभिन्न जीव विज्ञानों और बायो टेक्नोलॉजी के अलग-अलग क्षेत्रों को मिलाकर बेहतर चिकित्सा उपचार तैयार करने पर मंथन किया। इस अवसर पर कई रोचक निष्कर्ष और अध्ययन रिपोर्ट्स प्रस्तुत की गईं। रांची से आए वैज्ञानिकों डॉ. एसके गंगवार और डॉ. एमके सिन्हा ने बताया कि मकड़ी के जाले और रेशम के तंतुओं में अलानिन ग्लाइसिन और टयरोसिन नामक फाब्रोइन प्रोटीन पाए जाते हैं जो वजन में हल्के लेकिन काफी मजबूत होते हैं। इनकी वजह से रेशम का उपयोग वस्त्र बनाने में होता रहा है, जबकि इनका चिकित्सा विज्ञान में भी उपयोग हो सकता है। उन्हाेंने अपने अध्ययनों के हवाले से बताया कि इनमें मौजूद इलास्टिसिटी, मजबूती और रसायनों व जैविक खतरों से प्राकृतिक तौर पर सुरक्षित होने के कारण टांके लगाने में धागे की जगह इसका उपयोग किया जा सकता है। वहीं कृत्रिम रक्त शिराओं के निर्माण में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। अभी टांके में उपयोग हो रहे धागों से घाव में रक्तस्राव की संभावना बनी रहती है। वहीं ये तत्व प्राकृतिक रूप से हमारी कोशिकाओं से जुड़ने और नई कोशिकाओं के निर्माण में सहयोगी बनने का काम करते हैं। ऐसे में न केवल घाव जल्दी भर सकेंगे, बल्कि संक्रमण का खतरा भी खत्म होगा। डॉ. गंगवार के अनुसार मकड़ी के जाले और भी ज्यादा उपयोगी साबित हो सकते हैं क्योंकि इनमें सेरिसिन तत्व नहीं होता जिससे कोशिकाओं के निर्माण में मदद मिलती है। हालांकि मकड़ियों के उपयोग लायक जाले हासिल करना चिकित्सा में इनकी जरूरत को पूरा करने में बड़ी दिक्कत साबित हो सकती है। ऐसे में रेशम के तंतुओं का उत्पादन बढ़ाने की बात वे कहते हैं जो चिकित्सा विज्ञान में उपयोग हो सकेगा।
लाइफ साइंस न्यूज वेब पोर्टल लांच ः इस व्याख्यान से पहले इस दो दिवसीय सेमिनार का विधिवत उद्घाटन यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, सोलन के वीसी डॉ. केआर धीमान ने किया। आयोजन सचिव अंकुर मोहन ने बताया कि इस मौके पर देश के विभिन्न संस्थानों के अध्ययनकर्ताओं ने 12 ओरल प्रजेंटेशन भी दिए। अतिथियों ने बायो-इन्फोटेक टाइम्स नामक लाइफ साइंस न्यूज वेब पोर्टल को लांच किया। इसके जरिए बायोटेक्नोलॉजी में दुनिया भर में हो रहे नए अध्ययनों की रिपोर्ट ली जा सकेगी।
...तो बायोटेक्नोलॉजी और फार्मेसी में हम हो जाएंगे अव्वल ः इस मौके पर माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय कटरा की डॉ. शारदा पोटूकुच्ची ने अपने पेपर में बताया कि देश में अनुमानित करीब 45 हजार औषधीय पौधे हैं, जो विश्व का 90 प्रतिशत है। इनमें से सिर्फ साढ़े सात हजार का ही प्रोफाइल अब तक तैयार किया जा सका है। इस क्षेत्र में विस्तृत अध्ययन करते हुए हम बायोटेक्नोलॉजी और फार्मेसी के क्षेत्र में विश्व में प्रथम स्थान पर आ सकते हैं। आज विश्व की 80 फीसदी दवाएं पौधों से हासिल तत्वों से ही बनती हैं जिनका वर्ष 2015 में 93.15 खरब डॉलर का बाजार हो जाएगा।
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किडनी बायोप्सी पर सेमिनार ः एसजीपीजीआई में शनिवार को किडनी प्रत्यारोपण के मामलों में सफलता बढ़ाने के लिए सेमिनार का आयोजन किया गया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से जुटे किडनी रोग विशेषज्ञों ने किडनी की बायोप्सी को मौजूदा वक्त की जरूरत बताया। उनका कहना था कि किडनी की बायोप्सी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अक्सर प्रत्यारोपित गुर्दा बेहतर काम नहीं कर पाता। एसजीपीजीआई निदेशक डॉ. आरके शर्मा ने बताया कि संक्रमण, इम्युनोसप्रेसिव दवाओं के साइड इफेक्ट्स और शरीर द्वारा प्रत्यारोपण को अस्वीकार करना इसकी वजह हो सकती हैं। उन्हाेंने इन मामलों की अध्ययन रिपोर्ट के विश्लेषण और बयोप्सी को सटीक इलाज के लिए जरूरी बताया। इस मौके पर प्रो. मनोज जैन, प्रो. नारायण प्रसाद, प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया आदि ने व्याख्यान दिए।
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लाइफ साइंस न्यूज वेब पोर्टल लांच ः इस व्याख्यान से पहले इस दो दिवसीय सेमिनार का विधिवत उद्घाटन यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, सोलन के वीसी डॉ. केआर धीमान ने किया। आयोजन सचिव अंकुर मोहन ने बताया कि इस मौके पर देश के विभिन्न संस्थानों के अध्ययनकर्ताओं ने 12 ओरल प्रजेंटेशन भी दिए। अतिथियों ने बायो-इन्फोटेक टाइम्स नामक लाइफ साइंस न्यूज वेब पोर्टल को लांच किया। इसके जरिए बायोटेक्नोलॉजी में दुनिया भर में हो रहे नए अध्ययनों की रिपोर्ट ली जा सकेगी।
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...तो बायोटेक्नोलॉजी और फार्मेसी में हम हो जाएंगे अव्वल ः इस मौके पर माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय कटरा की डॉ. शारदा पोटूकुच्ची ने अपने पेपर में बताया कि देश में अनुमानित करीब 45 हजार औषधीय पौधे हैं, जो विश्व का 90 प्रतिशत है। इनमें से सिर्फ साढ़े सात हजार का ही प्रोफाइल अब तक तैयार किया जा सका है। इस क्षेत्र में विस्तृत अध्ययन करते हुए हम बायोटेक्नोलॉजी और फार्मेसी के क्षेत्र में विश्व में प्रथम स्थान पर आ सकते हैं। आज विश्व की 80 फीसदी दवाएं पौधों से हासिल तत्वों से ही बनती हैं जिनका वर्ष 2015 में 93.15 खरब डॉलर का बाजार हो जाएगा।
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किडनी बायोप्सी पर सेमिनार ः एसजीपीजीआई में शनिवार को किडनी प्रत्यारोपण के मामलों में सफलता बढ़ाने के लिए सेमिनार का आयोजन किया गया। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से जुटे किडनी रोग विशेषज्ञों ने किडनी की बायोप्सी को मौजूदा वक्त की जरूरत बताया। उनका कहना था कि किडनी की बायोप्सी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अक्सर प्रत्यारोपित गुर्दा बेहतर काम नहीं कर पाता। एसजीपीजीआई निदेशक डॉ. आरके शर्मा ने बताया कि संक्रमण, इम्युनोसप्रेसिव दवाओं के साइड इफेक्ट्स और शरीर द्वारा प्रत्यारोपण को अस्वीकार करना इसकी वजह हो सकती हैं। उन्हाेंने इन मामलों की अध्ययन रिपोर्ट के विश्लेषण और बयोप्सी को सटीक इलाज के लिए जरूरी बताया। इस मौके पर प्रो. मनोज जैन, प्रो. नारायण प्रसाद, प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया आदि ने व्याख्यान दिए।