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प्यार के राही शानू को नफरत खा गई
Lucknow
Updated Sun, 20 Jan 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। उसका जुर्म बस इतना था कि वह मजलिस सुनने गया था। वहां से लौट कर अपने परिवार के साथ उसे खाना खाना था, मगर वह घर के रास्ते में नफरत की भेंट चढ़ गया। सुलेमान उर्फ शानू की यही छोटी सी आखिरी कहानी है। बुलंदबाग की संकरी गलियों के हर मोड़ पर पुलिस के जवान मुस्तैद हैं। यहीं है डिप्टी अजीम साहब का इमामबाड़ा, जिसके बाहर बुधवार की उस भयानक काली रात को गोलियां चली थीं। फायरिंग का शिकार हुआ था 30 साल का शानू। जिंदगी में शानू ने प्यार करके रिश्ते बनाए मगर नफरत उसको खा गई। यह संवाददाता जब बुलंदबाग में शानू का घर ढूंढते हुए पहुंचा तो करीब आधा किलोमीटर पहले से ही 10 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक सभी उसका पता बताने को तैयार थे। घर पहुंचने पर पता चला कि ताला लगा है। पत्नी और पांच साल की बेटी मुफ्तीगंज गए हैं। अभी कुछ दिन वहीं रहेंगे। घर के बाहर मिले उनके एक रिश्तेदार मोहम्मद ईशान रुंधे गले से बताते हैं, ‘बड़ा मोहब्बती लड़का था। सभी का प्यारा। हमेशा मुस्कुराता रहता था। प्यार को अपनी जिंदगी में इस कदर अहमियत दी कि मजहब की दीवार तोड़ कर करीब सात साल पहले सीमा यादव से शादी की। शुरुआत में घर वालों ने कुछ मुखालफत की, लेकिन बाद में सब कुछ ठीक हो गया। एक ठेकेदार के साथ थोड़ा-बहुत काम करके शानू जिंदगी बसर कर रहा था। पत्नी और पांच साल की बेटी के साथ किराए पर रहकर खुश था’। मां-बाप के गुजरने के बाद बड़े अब्बा और अम्मी का सहारा उसको मिला। बड़े अब्बा सैय्यद मो. वसी की बेगम बताती हैं कि वह तो मेरा बेटा था। मजलिस के एक रोज पहले ही तो घर आया था। सभी बहनों का दुलारा था। शानू की बेटी सालिहा भी घर आती थी। वह साफ कहती हैं कि शानू की बेगम और बेटी हमारे साथ रहें, मगर शानू के कातिलों को न तो यहां की अदालत और न ही अल्लाह की अदालत में कोई भी रहम मिले। शानू जिंदगी भर प्यार की राह पर चलता रहा, मगर आखिर में नफरत उसको अपने साथ ले गई।
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