100G इंटरनेट: भूल जाइये 4G और 5G, अब आ रहा है 100G! भारत के पास होगा दुनिया का सबसे पावरफुल नेटवर्क लैब
What is 100G Internet: चेन्नई में नोकिया के दुनिया के सबसे बड़े रिसर्च सेंटर के खुलने के साथ ही '100G इंटरनेट' चर्चा का विषय बन गया है। यह तकनीक इंटरनेट की रफ्तार को एक नए युग में ले जाने वाली है, जो न केवल डेटा ट्रांसफर को तेज करेगी बल्कि डिजिटल इंडिया की तस्वीर भी बदल देगी।

विस्तार
आज के दौर में स्मार्टफोन के जरिए हर घर में इंटरनेट पहुंच चुका है। अब वह दौर भी गुजर चुका जब लोग इंटरनेट की कम स्पीड से परेशान रहते थे। 4G इंटरनेट आने के बाद अब कंपनियों के बीच इंटरनेट को सस्ता बनाने से साथ फास्ट बनाने की भी जंग चल रही है। ऐसे में इंटरनेट कनेक्टिविटे के क्षेत्र में कई रिसर्च और डेवलपमेंट चल रहे हैं। इसी क्रम में फिनलैंड की कंपनी नोकिया ने तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में अपने सबसे बड़े रिसर्च सेंटर की शुरुआत की है। इस रिसर्च सेंटर में कंपनी फिक्स्ड इंटरनेट को फास्ट बनाने की तकनीकों पर काम कर रही है। इसी सेंटर में 100G इंटरनेट पर भी काम चल रहा है। लेकिन आखिर यह 100G इंटरनेट क्या है और यह हमारे वर्तमान इंटरनेट से कितना अलग है? इस रहस्य को समझने के लिए हमें डेटा के उस सफर को जानना होगा जो प्रकाश की गति से तय होता है।
100G इंटरनेट आखिर है क्या?
आसान शब्दों में कहें तो 100G का मतलब है '100 गीगाबिट प्रति सेकंड' (100 Gbps) की रफ्तार। यह आपके घर में इस्तेमाल होने वाले सामान्य ब्रॉडबैंड कनेक्शन से सैकड़ों गुना अधिक शक्तिशाली है। जहां वर्तमान में हम 100 Mbps या 1 Gbps की रफ्तार को बहुत तेज मानते हैं, वहीं 100G तकनीक डेटा ट्रांसफर की क्षमता को एक अलग ही स्तर पर ले जाती है। यह तकनीक मुख्य रूप से बड़े डेटा सेंटर्स, टेलीकॉम टावरों और क्लाउड कंप्यूटिंग के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करती है, ताकि इंटरनेट ट्रैफिक बिना किसी देरी या रुकावट के चल सके।
कैसे काम करता है 100G नेटवर्क?
100G इंटरनेट का पूरा ढांचा फाइबर ऑप्टिक तकनीक पर टिका होता है। इसमें डेटा बिजली के संकेतों के बजाय रोशनी की किरणों के रूप में सफर करता है। इस प्रक्रिया में 'कोहेरेंट ऑप्टिक्स' नामक एक विशेष तकनीक का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक डेटा को रोशनी की तरंगों में इस तरह एन्कोड करती है कि एक ही ऑप्टिकल फाइबर केबल से विशाल मात्रा में डेटा एक साथ भेजा जा सके। नोकिया का चेन्नई स्थित नया केंद्र इसी तकनीक को और अधिक कुशल बनाने पर रिसर्च करेगा।
DWDM तकनीक क्या भूमिका निभाती है?
इस सुपरफास्ट रफ्तार को हासिल करने के लिए 'डेंस वेवलेंथ डिवीजन मल्टीप्लेक्सिंग' (DWDM) का सहारा लिया जाता है। आप इसे एक ऐसी सड़क की तरह समझ सकते हैं जिस पर अलग-अलग रंगों की रोशनी के लिए अलग-अलग लेन बनी हों। यह तकनीक एक ही फाइबर स्ट्रैंड पर प्रकाश के अलग-अलग रंगों का उपयोग करके डेटा भेजती है। इससे केबल बिछाने का खर्च कम होता है और डेटा ले जाने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। चेन्नई का नया लैब इसी तकनीक के जरिए 10G से लेकर 100G तक के नेटवर्क का परीक्षण करेगा।
100G तकनीक की मुख्य खूबियां
इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत इसकी बैंडविड्थ है, जो हर सेकंड अरबों बिट्स डेटा संभाल सकती है। डेटा पहुंचने में देरी यानी लेटेंसी बेहद कम होती है, जिससे वीडियो कॉल, ऑनलाइन गेमिंग और लाइव स्ट्रीमिंग जैसे काम बिना रुकावट के होते हैं। इसके अलावा, इसमें एडवांस एरर करेक्शन सिस्टम होता है, जो लंबी दूरी तक डेटा भेजते समय भी उसकी गुणवत्ता बनाए रखता है।
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आम यूजर को क्या फायदा होगा?
हालांकि 100G इंटरनेट सीधे आपके घर तक अभी नहीं पहुंचेगा, लेकिन इसका असर जरूर दिखेगा। यह तकनीक मौजूदा 5G और भविष्य की 6G सेवाओं को मजबूती देगी। जब नेटवर्क का बैकबोन इतना मजबूत होगा, तो वीडियो स्ट्रीमिंग बिना बफरिंग, तेज क्लाउड सेवाएं, बेहतर ऑनलाइन गेमिंग और भरोसेमंद डिजिटल प्लेटफॉर्म संभव हो पाएंगे।