एसी की छुट्टी करने आ रही नई कूलिंग तकनीक: तेज हुई ग्लोबल रिसर्च, जानें कैसे बिना गैस-रेफ्रिजरेंट ठंडा करेगी घर

जागृति
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीजागृति
Tue, 14 Jul 2026 10:56 AM IST
सार

Refrigerant Free AC:

क्या आने वाले समय में एसी में गैस भरवाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। यूरोप में बढ़ती एसी की मांग को देखते हुए दुनिया भर के वैज्ञानिक ऐसी नई कूलिंग टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, जो बिना रेफ्रिजरेंट के घरों को ठंडा कर सकती है। आइए जानते है यह तकनीक क्या है? कैसे काम करती है और अभी यह किस चरण में है...

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New Cooling Technology Replace Traditional AC, Here How Works
कूलिंग की नई तकनीक पर रिसर्च जारी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : एआई जनरेटेड

    विस्तार

    Solid-State Cooling Technology:

    एसी... भारत जैसे देश में गर्मियों के दौरान लोगों को राहत देने का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। हालांकि, इसे चलाने के लिए काफी बिजली और रेफ्रिजरेंट गैस की जरूरत होती है। यही वजह है कि अब दुनिया भर के वैज्ञानिक ऐसी नई कूलिंग टेक्नोलॉजी विकसित करने में जुटे हैं, जो बिना पारंपरिक रेफ्रिजरेंट के भी इमारतों को ठंडा कर सके।

    यह तकनीक उन देशों और इलाकों के लिए भी उम्मीद बन सकती है, जहां हर घर में एयर कंडीशनर लगाना आसान या संभव नहीं है। हाल ही में यूरोप में रिकॉर्ड गर्मी और उससे जुड़ी वायरल तस्वीरों-वीडियो ने भी ऐसी वैकल्पिक कूलिंग तकनीकों की जरूरत को दिखाया था। फिलहाल ये तकनीकें टेस्टिंग के दौर में हैं, लेकिन इन्हें भविष्य की कूलिंग टेक्नोलॉजी माना जा रहा है।

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    क्यों बढ़ाई नई Cooling Technology की जरूरत?

    यूरोप समेत दुनिया के कई हिस्सों में लगातार बढ़ती गर्मी ने एसी सिस्टम पर काफी प्रेशर डाल दिया है। जून में कई देशों में तापमान 40 के ऊपर पहुंच गया, जिसके बाद पोर्टेबल एसी और पंखों की मांग अचानक बढ़ गई।इसके बाद इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का अनुमान लगाया कि वर्ष 2050 तक दुनिया के लगभग दो-तिहाई घरों में एयर कंडीशनिंग हो सकती है। फिलहाल यूरोप के करीब 20% घरों में एसी है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा लगभग 90% और ब्रिटेन में करीब 4% है।

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    यह नई तकनीक क्या है?

    इस नई तकनीक को सॉलिड-स्टेट कूलिंग टेक्नोलॉजी कहा जा रहा है। जिसका उद्देश्य रेफ्रिजरेंट गैस के बिना कूलिंग करना है। इसमें पारंपरिक गैसों की जगह ऐसे खास मटेरियल्स यानी विशेष सामग्री का उपयोग किया जाता है, जो दबाव, मैग्नेटिक फील्ड या इलेक्ट्रिक करंट मिलने पर अपना तापमान बदल देती हैं। इस तकनीक से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों की जरूरत नहीं पड़ती।वहीं, जर्मनी की सारलैंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक निकल-टाइटेनियम (Nickel-Titanium) मिश्र धातु पर काम कर रहे हैं। इस तकनीक को इलास्टोकैलोरिक कूलिंग (Elastocaloric Cooling) कहा जाता है।वैज्ञानिकों के अनुसार, जब इस धातु को खींचकर छोड़ा जाता है, जो यह ठंड पैदा करती है। टेस्टिंग में यह तकनीक कमरे का तापमान लगभग 5 से 10 डिग्री सेल्सियस तक कम करने में सक्षम दिखाई दी है।रिसर्च टीम आयरलैंड की कंपनी Exergyn के साथ मिलकर रेफ्रिजरेंट-फ्री हीट पंप भी विकसित कर रही है। उनका लक्ष्य आने वाले कुछ वर्षों में नई इमारतों में इसका शुरुआती इस्तेमाल शुरू करना है।

    अलग-अलग तकनीकों पर काम कर रहीं ये कंपनियां

    आपको बता दें कि जर्मनी अकेला देश नहीं है, जो कूलिंग टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है। दुनिया भर में तमाम ऐसी कंपनियां है तो नई कूलिंग तकनीकों पर काम कर रही हैं। कुछ के नामों का जिक्र नीचे किया गया है।Mimic Systems (मिमिक सिस्टम्स) सेमीकंडक्टर आधारित हीट पंप विकसित कर रही है, जिसका प्रोटोटाइप वैंकूवर के एक अपार्टमेंट में लगाया गया है।Magnotherm (मैग्नोथर्म) मैग्नेटिक फील्ड आधारित कूलिंग सिस्टम पर काम कर रही है और सुपरमार्केट में इसकी टेस्टिंग कर चुकी है।Barocal (बारोकैल) प्लास्टिक क्रिस्टल्स आधारित तकनीक विकसित कर रही है, जो दबाव मिलने पर गर्मी बाहर निकालते हैं। कंपनी इस प्रोजेक्ट के लिए 10 मिलियन डॉलर की फंडिंग भी जुटा चुकी है।

    AC क्यों बन रहे हैं चुनौती?

    हम जिस एसी का इस्तेमाल करते हैं, उनमें से अधिकांश एयर कंडीशनर फ्लोरिनेटेड रेफ्रिजरंट गैसों का उपयोग करते हैं। ये सिस्टम प्रभावी जरूर हैं, लेकिन इनमें ऊर्जा की खपत ज्यादा होती है। यदि इन गैसों का रिसाव हो जाए, तो इनका ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड से हजारों गुना ज्यादा हो सकता है। यूरोपीय संघ ने 2024 में इन गैसों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का फैसला भी किया है।

    यह नई कूलिंग टेक्नोलॉजी बाजार में कब तक आएगी?

    फिलहाल अधिकांश नई कूलिंग तकनीकें रिसर्च और शुरुआती ट्रायल के चरण में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये तकनीकें काफी संभावनाएं दिखाती हैं, लेकिन इन्हें बड़े स्तर पर अपनाने में अभी समय लगेगा। बाजार में इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बड़े निर्माता इन्हें कितनी जल्दी अपनाते हैं।

    सिर्फ नई मशीनें नहीं, इमारतों का डिजाइन भी बदलेगा

    एक्सपर्ट्स यह भी कह रहे हैं कि भविष्य में केवल नई कूलिंग मशीनें ही समाधान नहीं होंगी। शेडिंग, बेहतर वेंटिलेशन, रिफ्लेक्टिव मटेरियल और स्मार्ट बिल्डिंग डिजाइन जैसी तकनीकों पर भी बराबर ध्यान देना होगा ताकि कूलिंग की जरूरत कम हो। इसी दिशा में पेरिस जैसे शहर पहले से ही नदी के ठंडे पानी का उपयोग करने वाले डिस्ट्रिक्ट कूलिंग नेटवर्क का विस्तार कर रहे हैं।

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