'हथियार' के साथ-साथ सिरदर्द भी है सोशल मीडिया

टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Tue, 21 Feb 2017 04:04 PM IST
benefits and side effects of social media
सोशल मीडिया - फोटो : Astute Media

    भारत की सवा अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फोन हैं। इनमें से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन हैं। 15.5 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सऐप पर रहते हैं। इन आंकड़ों को देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं कि राजनातिक पार्टियां ऑनलाइन कैंपेन या कहें सोशल मीडिया के इस्तेमाल को तवज्जो क्यों दे रहीं हैं।

    बीते कुछ सालों में चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी जरूरी हो गई है, ये लैंस प्रिंस अपनी किताब 'द मोदी इफेक्ट' में बताते हैं। वो कहते हैं कि "मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही समझ चुके थे कि लोगों तक सीधे पहुंचने के लिए सोशल मीडिया बेहद जरूरी है। उनके लिए ये केवल जुनून नहीं बल्कि उनकी जरूरत बन गया था और साल 2014 में उनकी जीत के पीछे इसकी अहम भूमिका रही थी।"

    2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जिस तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया उसे देख कर फाइनेंशियल टाइम्स ने तो मोदी भारत का पहला सोशल मीडिया प्रधानमंत्री तक कह डाला था। मोदी ने भी चुनाव जीतने के बाद सोशल मीडिया की भूमिका को स्वीकार करते हुए ट्वीट किया था, "इसके कारण अन्य नेताओं के झूठ और झूठे वायदे रैली के मंच से ज्यादा दूर नहीं जा पाए।"

    कैसा-कैसा इस्तेमाल?

    मिंत्रा
    मिंत्रा

    सोशल मीडिया - फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप के ज़रिए राजनीतिक दल लोगों तक पहुंचने के लिए हर तरह की कोशिश कर रहे हैं. खास कर मतदान से ऐन पहले। लोगों तक मन की बात पहुंचाने के लिए ये एक बड़े और प्रभावी माध्यम के तौर पर उभरा है। इतना ही नहीं कभी-कभी इसका इस्तेमाल अपने खिलाफ बोलने वालों को शांत करने के लिए भी किया जाता है।

    अपनी किताब 'आई एम ए ट्रोल' में स्वाति चतुर्वेदी भाजपा के सोशल मीडिया कंट्रोल रूम के बारे में बताती हैं कि बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान को ट्रोल करने, फिल्म दिलवाले के बहिष्कार की अपील करने, कांग्रेस नेताओं के खिलाफ ट्वीट करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया था। वो बताती हैं कि पार्टियों के पास हजारों ऐसे ट्विटर अकाउंट हैं जिनका इस्तेमाल वो जरूरत पड़ने पर करते हैं।

    ये आसान भी है! क्योंकि गलत नाम और परिचय के साथ ट्विटर अकाउंट बनाया जा सकता है और आपके खिलाफ कौन बोल रहा है आपको पता तक नहीं चल पाता। लैंस प्रिंस के अनुसार कभी-कभी किसी बड़े मुद्दे को छोटा बनाने के लिए भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है। कभी-कभी तो मीडिया में लग रहे आरोपों के उत्तर भी ट्रोलिंग के जरिए दिए जाते हैं।

    दोधारी तलवार

    ऐसा नहीं है कि हमेशा इसका असर जैसा सोचा गया, वैसा ही रहा। एक नेता के समर्थकों ने दूसरे को पप्पू और जोकर का नाम दिया तो जवाब में दूसरे के समर्थकों ने पहले नेता को फेंकू और जुमलेबाज कहा। एक ने कहा नेता छुट्टी मना रहे हैं तो दूसरे ने पलट कर कहा नेता विदेश यात्राओं में ही व्यस्त रहते हैं।

    कई बार तो इसके जरिए अफवाहों को भी हवा दे दी गई। बीते साल मिंत्रा के 'द्रोपदी के चीरहरण' से संबंधित एक ग्राफिक्स को लेकर काफी चर्चा हुई। इसके लिए मिंत्रा को ट्रोल किया गया लेकिन ये ग्राफ़िक्स असल में स्क्रोलड्रोल नाम की एक वेबसाइट ने कुछ महीने पहले बनाया था।

    मिंत्रा और स्क्रोलट्रोल के सफाई देने के बाद सोशल मीडिया पर ही सच सामने आ गया। राजनेता भी अफवाहों के प्रचार में सोशल मीडिया की भूमिका से इनकार नहीं करते। हालांकि वो मानते हैं कि ये अपने आप में दोधारी तलवार है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री विजय बहादुर पाठक कहते हैं, "घटनाओं से आप मुंह नहीं मोड़ सकते। आपको अपनी बात रखनी पड़ेगी। आम आदमी सवाल करता है तो दलों को उसका जवाब देना पड़ेगा, राजनीतिक दलों की ये जवाबदेही बनती है और सावधानी से चलना तो पड़ेगा। "

    इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

    मोदी
    मोदी - फोटो : BBC

    इस मामले में उनके राजनीतिक विरोधी कांग्रेस के लोग भी उनके साथ खड़े हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रवक्ता वीरेंद्र मदान के अनुसार बीते सालों के मुकाबले चुनावों में प्रचार के माध्यम बदले हैं। वो कहते हैं, "प्रचार के नए माध्यम कारगर भी हैं लेकिन कभी-कभी इनमें धोखा भी मिलता है। कुछ लोग बिना सोचे समझे चीजें डाल देते हैं, गलत चीजें लिख देते हैं लेकिन इनकी संख्या कम होती है। "

    कभी सोचा है आम जनता को सोशल मीडिया की आदत पड़ गई तो क्या होगा? इसका एक रूप 2016 में देखने को मिला। 2015 में जब मोदी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने अचानक पाकिस्तान पहुंचे थे तो इसके लिए लोगों ने सराहना की। लेकिन साल 2016 में उड़ी हमला और सर्जिकल स्ट्राइक्स के दावे के बाद जब मोदी ने ट्विटर पर नवाज शरीफ के जन्मदिन की बधाई दी तो लोगों का ग़ुस्सा फूट पड़ा। कई बार कुछ मुद्दों पर मोदी की चुप्पी भी लोगों को खलने लगी और लोगों ने सवाल किया कि आखिर मोदी कुछ बोल क्यों नहीं रहे।

    फिर भी ऐ यार, सोशल मीडिया से प्यार

    चुनावों पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिर रिफॉर्म के संस्थापक जगदीप छोकर कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि वो सोशल मीडिया के जरिए वो अधिक लोगों तक कम खर्चे में पहुंच सकती हैं। पार्टियां समझती हैं कि प्रिंट या टीवी मीडिया के मुकाबले सोशल मीडिया पर निगरानी रख पाना थोड़ा मुश्किल है और इससे वो चुनाव आयोग की स्क्रूटिनी से भी थोड़ा बच सकते हैं।

    उनका मानना है कि ये भ्रम है कि इससे बड़ी जनसंख्या तक पहुंच सकता है क्योंकि ये सिर्फ उन तक पहुंचता है जो इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। कहीं इसके बारे में जानकारी नहीं है, तो कहीं फोन ही नहीं है, कहीं कहीं तो इंटरनेट ही नहीं है। भारत के 50-60 फीसद इलाकों में इंटरनेट पहुंचने में अभी देरी है। हालांकि वो मानते हैं कि एक ऐसा वर्ग जरूर है जहां तक इंटरनेट और पार्टियों - दोनों की ही पहुंच है।

    क्या वाकई कोई प्रभाव पड़ता है?

     सेल्फी
    सेल्फी

    उत्तर प्रदेश में पढ़ाई कर रहे राजीव कुमार सिंहले कहते हैं, "युवा इससे जुड़ चुका है और इसलिए परंपरागत तरीके से प्रचार के सोशल मीडिया पर होने वाला प्रचार का असर तो है, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि परंपरागत तरीके ही अधिक कारगर हैं। "

    वो कहते हैं इसके जरिए "प्रचार कम और दुष्प्रचार अधिक दिखता है। पार्टियां संप्रदाय, जाति की बातकर वोट लेने की कोशिश अधिक करती हैं, लेकिन अपनी उपलब्धियों पर उनका कम ध्यान होता है।"

    लेकिन बी-टेक कर रहे छात्र प्रज्ञान की सोच इससे अलग है। वो मानते हैं, "हम लोग युवा हैं। अगर कोई नेता व्हाट्सऐप और फेसबुक के जरिए प्रचार करते हैं तो हम उनसे सीधा जुड़ जाते हैं और हमें लगता है कि हम उनसे सीधी सीधा जुड़ जाते हैं। और हमसे वो सीधे वोट मांग सकते हैं।"

    इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम जनता तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया एक असरदार जरिए के रुप में उभरा है और राजनीतिक पर्टियां भी इसका भरपूर लाभ उठा रही हैं।

    लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे केवल फायदा ही पहुंचेगा, कई बार इससे पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचता है।

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