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कुश्ती को मिला ‘ओलंपिक अभयदान’

Sun, 08 Sep 2013 11:43 PM IST
नई दिल्ली, अमर उजाला
नई दिल्ली, अमर उजाला Updated Sun, 08 Sep 2013 11:43 PM IST
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wrestling will be in olympic

सुशील कुमार हों या योगेश्वर दत्त या फिर कोई भी कुश्ती प्रेमी, शुक्रवार की सुबह से इनके मन में एक विश्वास था ओलंपिक से कुश्ती का साथ कोई जुदा नहीं कर सकता है।

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लेकिन इस विश्वास के साथ मन में एक भय भी था। आखिर क्या होगा? कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए?

आखिरकार भय हार गया और विश्वास की जीत हो गई। जी हां, ब्यूनस आयर्स में आईओसी की बैठक में कुश्ती ने स्क्वैश और बेसबाल-सॉफ्टबॉल पर बाजी मार ली है।

कुल 95 वोट में से 49 वोट हासिल कर कुश्ती ने 2020 व 2024 ओलंपिक के लिए अतिरिक्त खेलों के रूप में जगह बना ली है। बेसबाल को 26 व स्क्वैश को 23 वोट मिले।

सुशील कुमार अब तैयारियों के लिए बुडापेस्ट (हंगरी) बिलकुल खाली दिमाग से जा सकेंगे। सुशील और योगेश्वर के दिमाग पर सुबह से ही बोझ था। योगेश्वर ने तो पूरी तरह साफ कर दिया कि टोकियो को मेजबानी मिलने के बाद एक बड़ी आशा जागी है लेकिन मन में भय भी है।
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जैसे ही कुश्ती के बाजी मारने की खबर आई औरों की तरह ये दोनों भी उछल पड़े। सुशील कहते हैं कि यह देशवासियों की जीत है। यह बहुत बड़ा पल है। वह बेहद खुश हैं। अब बाकी का काम पहलवानों का है।
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आने वाले रियो ओलंपिक में वह खुद और दूसरे भारतीय पहलवान कुछ कर गुजरने के लिए उतरेंगे। सुशील के कोच यशवीर तो इतने खुश हैं कि वह कहते हैं कि बीजिंग ओलंपिक में सुशील के पदक जीतने पर जितने खुशी उन्हें हुई थी।

ठीक वैसी ही खुशी की अनुभूति आज उन्हें हो रही है। यह बहुत बड़ा निर्णय है। अगर कुश्ती ओलंपिक से अलग हो जाती तो शायद इस खेल की देश में वही स्थिति हो जानी थी जैसी खो-खो और कबड्डी की हो रखी है।

इस दौरान फीला अध्यक्ष नेनाद लालोविच ने फीला वेबसाइट पर इस खुशी की घोषणा करते हुए कहा कि वह आईओसी के सभी सदस्यों को कुश्ती को ओलंपिक में बरकरार रखने के लिए दिल से धन्यवाद करते हैं।

वह विश्वास दिलाते हैं कि इस खेल के आधुनिकीकरण के लिए जो कदम उठाए गए हैं वह आगे भी जारी रहेंगे। वह ओलंपिक मूवमेंट का हिस्सा बने रहने के लिए इस तरह का संघर्ष जारी रखेंगे।


उल्लेखनीय है कि बीते वर्ष आईओसी ने हैरानीजनक तरीके से कुश्ती को ओलंपिक के 25 कोर ग्रुप खेलों की सूची से बाहर कर दिया था। इसके बाद फीला ने अपने अध्यक्ष राफेल मार्टीनेटी को हटाकर कमान सर्बिया के इंजीनियर लालोविच को सौंपी जिन्होंने खेल की कायापलट करते हुए न सिर्फ नियम बदले बल्कि महिला कुश्ती को पुरुषों के बराबर ला खड़ा किया।

इन बदलाव के चलते कुश्ती को पहले सेंटपीटर्सबर्ग में आईओसी की कार्यकारिणी और आज ब्यूनस आयर्स में वोटिंग के जरिए ओलंपिक में बने रहने की सफलता मिली।

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