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जब हिटलर की नजर 'दद्दा' के अंगूठे के पास फटे जूतों पर टिक गई...
amarujala.com- Presented by: मुकेश झा
Updated Tue, 03 Oct 2017 11:58 AM IST
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ध्यानचंद
- फोटो : The indian express
मेजर ध्यानचंद हॉकी जगत का एक ऐसा नाम है जिसने हॉकी को पूरे विश्व में एक अलग पहचान दिलाई। ध्यानचंद की बराबरी फुटबाल के जादूगर पेले और क्रिकेट के सर्वकालिक महान बैट्समैन डॉन ब्रैडमैन से की जाती है।
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मेजर ध्यानचंद के बारे में दरअसल ऐसा माना जाता है कि जब वह हॉकी स्टिक के साथ मैदान में उतरते थे तो गेंद हॉकी स्टिक से चिपक जाती थी। साल 1936 का ओलंपिक जर्मनी की राजधानी बर्लिन में होना था, जहां हिटलर का शासन था। टीम की पहली सूची में ध्यानचंद का नाम ही नहीं था, जिस पर खूब बवाल हुआ। हालांकि बाद में टीम की कप्तानी ध्यानचंद को मिली। ध्यानचंद ने वहां भी दमदार हॉकी का प्रदर्शन किया जहां हर तरफ हिटलर की जय जयकार थी।
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साल 1936 में हुए ओलंपिक फाइनल के अगले दिन जर्मनी में यह ऐलान हुआ कि ओलंपिक जीतने वाली भारतीय टीम को जर्मनी के तानाशाह हिटलर मेडल पहनाएंगे। इस खबर को सुनकर मेजर ध्यानचंद रात भर सो नहीं पाए थे। उनको यह लग रहा था कि हिटलर से मिलना पड़ेगा।
इस बात की जानकारी भारत में जैसे ही पहुंची यहां के अखबार हिटलर के अजीबोगरीब फैसलों के बारे में छाप कर आशंका व्यक्त करने लगे। बहरहाल, अगले दिन हिटलर आए और उन्होंने ध्यानचंद की पीठ ठोंकी। उनकी नजर ध्यानचंद के अंगूठे के पास फटे जूतों पर टिक गई। ध्यानचंद से सवाल-जवाब शुरू हुआ।
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जब हिटलर को पता चला कि ध्यानचंद ब्रिटिश इंडियन आर्मी की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक जैसे छोटे ओहदे पर है, तो उसने ऑफर किया कि जर्मनी में रुक जाओ, सेना में कर्नल बना दूंगा। ध्यानचंद ने कहा, नहीं पंजाब रेजिमेंट पर मुझे गर्व है और भारत ही मेरा देश है। हिटलर ध्यानचंद को मेडल पहनाकर स्टेडियम से चले गए। उसके बाद ध्यानचंद की सांस में सांस आई।
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