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आखिर क्यों है ईद इनाम पाने का दिन?
मौलाना बहीदुद्दीन खान
Updated Tue, 29 Jul 2014 09:28 AM IST
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आज ईद उन फित्र का दिन है। इस्लाम में ईद उल फितर का त्यौहार हिजरत के पश्चात नियुक्त किया गया। हजरत मोहम्मद जब मक्का से हजरत कर मदीना आए तो उन्होंने देखा कि वहां हर साल दो त्यौहारों का चलन है।
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उन्होंने देखा कि इन दो दिनों में वहां लोग घूमते फिरते और खेलकूद अखाड़े करते। उन्होंने लोगों से कहा कि उनके लिए अल्लाह ने इससे बेहतर दो दिन नियत किए हैं। और वे दो दिन ईद उल फितर और ईद उल अजहा के दिन हैं। इस तरह इस्लाम में इन दो दिनों का रिवाज पड़ा।
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ईद उल फितर का दिन रमजान के रोजों के बाद आता है। इसलिए इसे इनाम का दिन कहा गया है। रमजान के महीने में इस्लाम मजहब को मानने वालों ने एक महीने खाने और पीने पर रोक लगाई थी। अब उन्हें छूट रहती है कि खूब अच्छा मनपसंद की चीज खाएं। इसका अर्थ है कि रमजान का महीना उनके लिए कर्म करने का महीना था और और ईद का दिन उस कर्म का इनाम पाने का दिन है।
ईद का आरंभ ईद का चांद दिखने से होता है। रमजान के महीने के अंतिम दिन सब लोगों की निगाह आसमान की तरफ होती है। जिसको चांद दिखाई देता है वह कह उठता है कि ए अल्लाह तू इस निकलने वाले चांद को हमारे लिए अमन का और सलामती का चांद बना दे और हम तेरी मर्जी पे चलें। तू इस महीने को अपनी बेशकीमती रहमत का महीना बना दे।
इस तरह ईद का चांद पूरी इस्लामी दुनिया के लिए ना सिर्फ खुशी का चांद होता है बल्कि वह उन्हें अपने खुदा से भी जोड़ देता है। वह उन्हें अपनी तरह से खुदा की याद दिलाता है, और लोग अपने लिए, पूरे संसार की इंसानियत के लिए दुआ मांगते हैं।
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ईद के चांद वाली रात को इसलाम मजहब को मानने वाले खुदा से दुआ मांगते हैं। और अपने और सारी इंसानियत के लिए नमाज पढ़ते हैं। सुबह होते ही सब तैय्यार होते हैं और अपने को पवित्र करके नए कपड़े पहनते हैं। छोटे बड़ों के साथ ईदगह जाते हैं। रास्ते में हर आने जाने वाले से दुआ सलाम करते हैं।
ईदगाह में सब एक हो जाते हैं। न कोई छोटा न बड़ा। अल्लाह के आगे सब बंदे हैं। नमाज के बाद तकरीर होती है। इसमें बताया जाता है कि खुदा का बनाया हर इंसान एक जैसा है। उसमें ऊंच नीच नहीं देखनी चाहिए। इसलिए भी ईद में कमजोर गरीब लोगों को मदद की जाती है। ईद का दिन आपसी खुशी का दिन बनाने के लिए खुदा ने जो सबसे बड़ी चीज नियत की है, वह फितर है।
खुशहाल लोग, अपनी अपनी हैसियत से कुछ पैसा या जरूरत का सामान गरीब लोगों को देते हैं। इस तरह उनको भी ईद की खुशी में शामिल किया जाता है। एक तरह से यह इस त्यौहार का बड़ा संदेश है। खुदा की दुनिया में कोई छोटा बड़ा नहीं, सबसे प्यार करो।
हमेशा इंसानियत के लिए सोचो। इससे वो भी अपने बच्चों के लिए नए कपड़े खरीद लेते हैं। इद उल फितर जैसे त्यौहार इसीलिए मनाए जाते हैं, ताकि लोगों में आपसी प्यार मोहब्बत बनी रहे। मोहब्बत का ये संदेश दूर दूर तक जाए।
यह त्यौहार इसलिए है कि इस दिन पूरे समाज के लिए खुशी का दिन बन जाए और वो तमाम लोग को नई जिंदगी देने वाला साबित हो। सच्ची ईद वही है, जिसमें सारी इंसानियत के लिए खुशी अमन की दुआ हो।