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गणेश जी को तुलसी तो शिव जी को शंख से नहीं चढ़ाते जल, जानिए क्यों

Wed, 09 Dec 2015 06:07 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 09 Dec 2015 06:07 PM IST
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tulsi is prohibited in lord ganesha's worship and shankh water to shiv shankar

गणेश जी के पूजन में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। पौराणिक कथानुसार एक बार गणेश जी गंगा किनारे तप कर रहे थे। इसी दौरान धर्मात्मज की नवयौवना तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। भ्रमण करते हुए तुलसी गंगा के तट पर पंहुचीं। उन्होंने तरुण गणेश जी को तपस्या में लीन देखा और उनपर मोहित हो गईं।

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विवाह की इच्छा से तुलसी ने उनका ध्यान भंग कर दिया। तुलसी की मंशा जानकर गणेश जी ने तप भंग करने को अशुभ बताया और स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर तुलसी के विवाह के प्रस्ताव को नकार दिया।
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गणेश जी के इंकार से तुलसी बहुत दुखी हुईं और आवेश में आकर उन्होंने गणेश जी को दो विवाह का शाप दे दिया। उधर गणेश जी ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि उसका विवाह एक असुर से होगा।
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एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने गणेश जी से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूड़ राक्षस से होगा। किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।

तब से भगवान श्री गणेश जी की पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता है।

शिव शंकर को क्यों नहीं चढ़ाते हैं शंख से जल?

tulsi is prohibited in lord ganesha's worship and shankh water to shiv shankar

सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाना शुभ माना जाता है लेकिन भगवान भोले नाथ पर शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है। इस संबंध में शिवपुराण में बताया गया है कि शंखचूड़ नाम का एक महापराक्रमी दैत्य था। शंखचूड़ दैत्यराज दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ ने घोर तपस्या कर विष्णु भगवान से तीनों लोकों के लिए अजेय और महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा था।

उधर शंखचूड़ ने जब बड़ा हुआ तो उसने पुष्कर में घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके लिए बृह्मा जी ने उसे श्रीकृष्ण कवच दिया और धर्मात्मज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी।

ब्रह्मा जी के आदेशानुसार तुलसी और शंखचूड़ का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। भगवान विष्णु ने खुद शंखचूड़ के पिता दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था इसलिए देवताओं की मदद नही कर सकते थे। सभी देवता शिव जी के पास पहुंचे।

श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पाए तो भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का रूप धरकर शंखचूड़ से श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी के शील का हरण कर लिया।

इसी दौरान शिव शंकर मे शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था इसलिए  लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है। शिव ने उसका वध किया था इसलिए शंख का जल शिव जी को नहीं चढ़ाया जाता है।

हलाहल पीने वाले भोलेनाथ को नहीं पसंद केतकी का फूल

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आपको जानकर हैरानी होगी कि हलाहल का पान करने वाल भोले भंडारी को एक फूल अप्रिय है। ये फूल केतकी का फूल है। इसे शिव शंकर की पूजा में नहीं चढ़ाया जाता है। उत्तर शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि कौन बड़ा है।

झगड़ा बढ़ने पर भोले नाथ को न्यायाधीश बनना पड़ा। तब भोले नाथ ने अपनी माया से एक ज्योतिर्लिंग प्रकट किया और दोनों से कहा कि जो भी ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत बता देगा वही बड़ा कहलाएगा। आदि पता करने के लिए ब्रह्मा जी नीचे की ओर चल पड़े और भगवान विष्णु अंत पता करने के लिए ऊपर की ओर।

ब्रह्मा जी को ज्योतिर्लिंग का पता तो नहीं चला लेकिन पीछे मुड़कर देखा तो एक केतकी फूल भी उनके साथ नीचे आ रहा था। ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल को फुसलाकर झूठ बोलने के लिए तैयार किया और भगवान शिव के पास पहुंच गए। ब्रह्मा जी ने शिव जी से कहा कि मैंने ज्योतिर्लिंग के आदि का पता लगा लिया है और गवाह के रूप में केतकी के फूल को सामने कर दिया।

उधर भगवान विष्णु ने कहा कि वे ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं जान पाए हैं।भगवान शिव ब्रह्मा जी के झूठ को जान गए और ब्रह्मा जी का एक सिर काट दिया। तब से ब्रह्मा जी पंचमुख से चार मुख वाले हो गए और केतकी के फूल ने झूठ बोला था इसलिए भगवान शिव ने उसे अपनी पूजा में वर्जित कर दिया।

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