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Sharad Purnima 2024: शरद पूर्णिमा आज, क्यों इतनी खास होती है पूनम की यह रात ? जानिए पौराणिक मान्यताएं
Wed, 16 Oct 2024 11:20 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 16 Oct 2024 11:20 AM IST
सार
पौराणिक मान्यता के अनुसार चन्द्रमा का जन्म समुद्र मंथन से हुआ था। समुद्र के इसी मंथन से देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं और उन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया। माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था इसीलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है।
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शरद पूर्णिमा की शुभकामनाएं
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
Sharad Purnima 2024: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कोजोगार पूर्णिमा, रास पूर्णिमा और शरद पूर्णिमा कहा जाता है। शरद पूर्णिमा हमें स्वस्थ्य और निरोग रखने का दिन है। इस रात चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और वह अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है। इस रात्रि में चन्द्रमा का ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है। प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह व्रत लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने वाला है।
इसलिए खास है ये पूर्णिमा
नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए निशीथ काल में पृथ्वी पर भ्रमण करती है और माता यह भी देखती है कि कौन जाग रहा है? यानि अपने कर्त्तव्यों को लेकर कौन जागरूक है? जो व्यक्ति इस रात में जागकर मां लक्ष्मी की उपासना करते है मां लक्ष्मी की उन पर असीम कृपा होती है। ऐसी भी मान्यता है कि धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करने वालों को माता ऐश्वर्य, कीर्ति, यश और वैभव का आशीर्वाद देती हैं। इसी दिन चन्द्रमा अपनी बहन से मिलने पृथ्वी के और निकट आते हैं और पूरी पृथ्वी पर अपनी अमृतमयी किरणों की बौछार करते हैं।
श्रीकृष्ण ने रचाया था महारास
भगवान श्रीकृष्ण और राधा की अद्भुत और दिव्य रासलीलाओं का आरम्भ भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ। पूर्णिमा की श्वेत उज्जवल चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी नौ लाख गोपिकाओं के साथ स्वंय के ही नौ लाख अलग-अलग गोपों के रूप में आकर ब्रज में महारास रचाया था। चन्द्रमा की पूर्ण आभा अधिक अनुराग उत्पन्न करते हुए जड़ता में भी चेतनता का भाव उत्पन्न कर देती है। शरद पूर्णिमा को की गई पूजा-अर्चना व्यक्ति के नीरस सूखे जीवन में भी प्रेम अनुराग का रस घोल देती है।
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लक्ष्मी जी का जन्म
पौराणिक मान्यता के अनुसार चन्द्रमा का जन्म समुद्र मंथन से हुआ था। समुद्र के इसी मंथन से देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं और उन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया। माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था इसीलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। कुंआरी कन्याएं इस दिन सुबह सूर्य और चन्द्र देव की पूजा अर्चना करें तो उन्हें मनचाहे वर की प्राप्ति होती है। सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य के लिए इस दिन चन्द्रमा की भी पूजा अर्चना करनी चाहिए।
खुले आसमान के नीचे खीर रहने का महत्व
शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में खीर रखने का विधान है, खीर में मिश्रित दूध, चीनी और चावल के कारक भी चन्द्रमा ही है, अतः इनमें चन्द्रमा का प्रभाव सर्वाधिक रहता है। 3-4 घंटे तक खीर पर जब चन्द्रमा की किरणें पड़ती है तो यही खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसको प्रसाद रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है। इस रात्रि में चन्द्रमा की तरफ एकटक निहारने से या सुई में धागा पिरोने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
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इसलिए खास है ये पूर्णिमा
नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए निशीथ काल में पृथ्वी पर भ्रमण करती है और माता यह भी देखती है कि कौन जाग रहा है? यानि अपने कर्त्तव्यों को लेकर कौन जागरूक है? जो व्यक्ति इस रात में जागकर मां लक्ष्मी की उपासना करते है मां लक्ष्मी की उन पर असीम कृपा होती है। ऐसी भी मान्यता है कि धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करने वालों को माता ऐश्वर्य, कीर्ति, यश और वैभव का आशीर्वाद देती हैं। इसी दिन चन्द्रमा अपनी बहन से मिलने पृथ्वी के और निकट आते हैं और पूरी पृथ्वी पर अपनी अमृतमयी किरणों की बौछार करते हैं।
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श्रीकृष्ण ने रचाया था महारास
भगवान श्रीकृष्ण और राधा की अद्भुत और दिव्य रासलीलाओं का आरम्भ भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ। पूर्णिमा की श्वेत उज्जवल चांदनी में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी नौ लाख गोपिकाओं के साथ स्वंय के ही नौ लाख अलग-अलग गोपों के रूप में आकर ब्रज में महारास रचाया था। चन्द्रमा की पूर्ण आभा अधिक अनुराग उत्पन्न करते हुए जड़ता में भी चेतनता का भाव उत्पन्न कर देती है। शरद पूर्णिमा को की गई पूजा-अर्चना व्यक्ति के नीरस सूखे जीवन में भी प्रेम अनुराग का रस घोल देती है।
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लक्ष्मी जी का जन्म
पौराणिक मान्यता के अनुसार चन्द्रमा का जन्म समुद्र मंथन से हुआ था। समुद्र के इसी मंथन से देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं और उन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया। माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था इसीलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। कुंआरी कन्याएं इस दिन सुबह सूर्य और चन्द्र देव की पूजा अर्चना करें तो उन्हें मनचाहे वर की प्राप्ति होती है। सुख-समृद्धि एवं सौभाग्य के लिए इस दिन चन्द्रमा की भी पूजा अर्चना करनी चाहिए।
खुले आसमान के नीचे खीर रहने का महत्व
शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में खीर रखने का विधान है, खीर में मिश्रित दूध, चीनी और चावल के कारक भी चन्द्रमा ही है, अतः इनमें चन्द्रमा का प्रभाव सर्वाधिक रहता है। 3-4 घंटे तक खीर पर जब चन्द्रमा की किरणें पड़ती है तो यही खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसको प्रसाद रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है। इस रात्रि में चन्द्रमा की तरफ एकटक निहारने से या सुई में धागा पिरोने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।