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Shani Jayanti 2024: जानिए शनिदेव के दर्शन करते समय उनके नेत्रों में क्यों नहीं देखा जाता, पढ़ें रोचक कथा
Mon, 03 Jun 2024 12:39 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 03 Jun 2024 12:39 PM IST
सार
शनि देव से नजरें मिलाने से आप पर शनि देव की बुरी नजर पड़ सकती है क्योंकि इनकी दृष्टि अनिष्टकारक मानी गई है।
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shani dev: शनिदेव सभी ग्रहों में सबसे मंद गति से चलने वाले ग्रह है। शनिदेव को एक राशि से दूसरी राशि में जाने के लिए करीब ढाई वर्षों का समय लगता है।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Shani Jayanti 2024: हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल शनि जयंती 6 जून, गुरुवार को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शनि की पूजा करने से घर में सुख-शांति का वास होता है। साथ ही शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यह दिन शनिदेव की पूजा-अर्चना करने उनकी कृपा पाने के लिए श्रेष्ठ है। नवग्रहों में शनि को न्यायाधिपति माना गया है, वे मनुष्यों को उनके कर्मानुसार फल प्रदान करते हैं। ज्योतिष में शनि की दृष्टि बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव की पूजा करते समय नजरें नीचे रहना चाहिए। शनि देव से नजरें मिलाने से आप पर शनि देव की बुरी नजर पड़ सकती है क्योंकि इनकी दृष्टि अनिष्टकारक मानी गई है। आइए जानते हैं इससे जुडी एक पौराणिक कथा
इसलिए नहीं देखते हैं शनिदेव की आंखों में
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार युवावस्था में शनि के पिता सूर्यदेव ने उनका विवाह चित्ररथ की कन्या से करवा दिया। वह सती-साध्वी नारी सतत तपस्या में रत रहने वाली और परम तेजस्विनी थी। एक दिन वह ऋतु स्नान कर पुत्र प्राप्ति की इच्छा लिए शनिदेव के पास पहुंची, पर शनिदेव तो भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन थे, उन्हें ब्राह्य ज्ञान बिल्कुल नहीं था। उनकी पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई और अपना ऋतुकाल निष्फल जानकर उन्होंने क्रुद्ध होकर शनिदेव को श्राप दे दिया कि 'आज से तुम जिसकी ओर दृष्टि करोगे, उसका अंमगल हो जाएगा'। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया परन्तु अब तो वह श्राप से मुक्त करने में असमर्थ थी,अतः पश्चाताप करने लगीं। तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि किसी का अनिष्ट हो।
तब गणेश जी पर डाली दृष्टि
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, गणेशजी के सिर का धड़ से अलग होने का कारण शनि को बताया गया है। प्रसंग के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए ‘पुण्यक’नामक व्रत किया था और उनको इस व्रत के प्रभाव से पुत्र गणेश की प्राप्ति हुई। पूरा देवलोक भगवान शिव और माता पार्वती को बधाई देने और बालक को आशीर्वाद देने शिवलोक आ गया। अंत में सभी देवतागण बालक गणेश से मिलकर और उसे आशीर्वाद देकर जाने लगे। मगर, शनिदेव ने बालक गणेश को न तो देखा और न ही उनके पास गए। पार्वती ने इस पर शनिदेव को टोका। शनिदेव ने अपने श्राप की बात मां दुर्गा को बताई। देवी पार्वती ने शनैश्चर से कहा-'तुम मेरी और मेरे बालक की ओर देखो। धर्मात्मा शनिदेव ने धर्म को साक्षी मानकर बालक को तो देखने का विचार किया पर बालक की माता को नहीं । उन्होंने अपने बाएं नेत्र के कोने से शिशु के मुख की ओर निहारा। शनि की दृष्टि पड़ते ही शिशु का मस्तक धड़ से अलग हो गया। बाद में भगवान शिव ने गणेशजी के हाथी का सिर लगाया और गणेशजी जी गजानन कहलाए।
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इसलिए नहीं देखते हैं शनिदेव की आंखों में
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार युवावस्था में शनि के पिता सूर्यदेव ने उनका विवाह चित्ररथ की कन्या से करवा दिया। वह सती-साध्वी नारी सतत तपस्या में रत रहने वाली और परम तेजस्विनी थी। एक दिन वह ऋतु स्नान कर पुत्र प्राप्ति की इच्छा लिए शनिदेव के पास पहुंची, पर शनिदेव तो भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन थे, उन्हें ब्राह्य ज्ञान बिल्कुल नहीं था। उनकी पत्नी प्रतीक्षा करके थक गई और अपना ऋतुकाल निष्फल जानकर उन्होंने क्रुद्ध होकर शनिदेव को श्राप दे दिया कि 'आज से तुम जिसकी ओर दृष्टि करोगे, उसका अंमगल हो जाएगा'। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया परन्तु अब तो वह श्राप से मुक्त करने में असमर्थ थी,अतः पश्चाताप करने लगीं। तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि किसी का अनिष्ट हो।
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तब गणेश जी पर डाली दृष्टि
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार, गणेशजी के सिर का धड़ से अलग होने का कारण शनि को बताया गया है। प्रसंग के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए ‘पुण्यक’नामक व्रत किया था और उनको इस व्रत के प्रभाव से पुत्र गणेश की प्राप्ति हुई। पूरा देवलोक भगवान शिव और माता पार्वती को बधाई देने और बालक को आशीर्वाद देने शिवलोक आ गया। अंत में सभी देवतागण बालक गणेश से मिलकर और उसे आशीर्वाद देकर जाने लगे। मगर, शनिदेव ने बालक गणेश को न तो देखा और न ही उनके पास गए। पार्वती ने इस पर शनिदेव को टोका। शनिदेव ने अपने श्राप की बात मां दुर्गा को बताई। देवी पार्वती ने शनैश्चर से कहा-'तुम मेरी और मेरे बालक की ओर देखो। धर्मात्मा शनिदेव ने धर्म को साक्षी मानकर बालक को तो देखने का विचार किया पर बालक की माता को नहीं । उन्होंने अपने बाएं नेत्र के कोने से शिशु के मुख की ओर निहारा। शनि की दृष्टि पड़ते ही शिशु का मस्तक धड़ से अलग हो गया। बाद में भगवान शिव ने गणेशजी के हाथी का सिर लगाया और गणेशजी जी गजानन कहलाए।
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