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मां दुर्गा ने इस जग में ली श्री राम की परीक्षा, भगवान भी हो गए थे व्याकुल
Sun, 15 Dec 2019 08:49 AM IST
योगेश जोशी
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: योगेश जोशी
Updated Sun, 15 Dec 2019 08:49 AM IST
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धार्मिक कथाओं के अनुसार राम-रावण के बीच में भीषण युद्ध होता है। युद्ध के आरंभ में राम संपूर्ण पराक्रम से लड़ते है, फिर भी रावण का पलड़ा भारी रहता है। राम को यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य होता है कि स्वयं दुर्गा जो शक्ति की प्रतीक है, वह रावण के पक्ष में खड़ी हुई है। रणभूमि में राम दिव्य बाणों का उपयोग करते हैं तो देवी दुर्गा रावण के पक्ष में विशाल रूप ग्रहण करके उसे अपने कवच से सुरक्षित कर देती हैं।
राम के समस्त अस्त्र बुझ-बुझकर क्षीण होने लगते हैं। मां की शक्ति से अब यह युद्ध 'नर-वानर' का युद्ध नहीं रह गया था। भगवान राम भी यह सोचकर निस्तब्ध हो जाते हैं की मां दुर्गा अन्याय के साथ में क्यों खड़ी है, तब राम जामवंत को समझाते है की अब इस युद्ध में विजय के कोई आसार नहीं है।
रावण मां की शक्तियां तपस्या से प्राप्त करता है। जामवंत जी भगवान राम को भी तपस्या करने की सलाह देते हैं। जामवंत जी भगवान राम से कहते हैं कि रावण तो अहंकारी है और यदि अहंकाारी होकर वह शक्ति का पक्ष पा सकता है, तो आप तो उससे भी कम समय में 'शक्ति' को 'सिद्ध' कर सकते हो, आपको मां का पूजन करना चाहिए।
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राम की शक्ति पूजा में शक्ति की यह कल्पना मौलिक है। युद्ध का अंतिम लक्ष्य विजय ही होता है। सत्ता की निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। स्वयं राम शक्तियों से परिपूर्ण हैं।
यह सब एक दैवीय विधान है और शक्ति का यह खेल समझ से परे है, जिसमें नियति, न्याय के पक्ष को ही कमजोर बनाकर उसकी परीक्षा ले रही है। जब देवी दुर्गा ने राम की परीक्षा लेने के लिए यज्ञ के पूर्ण होने से पहले ही एक पुष्प को गायब कर दिया था तो भगवान राम पुष्प के स्थान पर अपने नयन का अर्पण करने लगे थे तभी मां दुर्गा प्रकट हुई और भगवान राम को विजय का आशीर्वाद दिया।
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राम के समस्त अस्त्र बुझ-बुझकर क्षीण होने लगते हैं। मां की शक्ति से अब यह युद्ध 'नर-वानर' का युद्ध नहीं रह गया था। भगवान राम भी यह सोचकर निस्तब्ध हो जाते हैं की मां दुर्गा अन्याय के साथ में क्यों खड़ी है, तब राम जामवंत को समझाते है की अब इस युद्ध में विजय के कोई आसार नहीं है।
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रावण मां की शक्तियां तपस्या से प्राप्त करता है। जामवंत जी भगवान राम को भी तपस्या करने की सलाह देते हैं। जामवंत जी भगवान राम से कहते हैं कि रावण तो अहंकारी है और यदि अहंकाारी होकर वह शक्ति का पक्ष पा सकता है, तो आप तो उससे भी कम समय में 'शक्ति' को 'सिद्ध' कर सकते हो, आपको मां का पूजन करना चाहिए।
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राम की शक्ति पूजा में शक्ति की यह कल्पना मौलिक है। युद्ध का अंतिम लक्ष्य विजय ही होता है। सत्ता की निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। स्वयं राम शक्तियों से परिपूर्ण हैं।
यह सब एक दैवीय विधान है और शक्ति का यह खेल समझ से परे है, जिसमें नियति, न्याय के पक्ष को ही कमजोर बनाकर उसकी परीक्षा ले रही है। जब देवी दुर्गा ने राम की परीक्षा लेने के लिए यज्ञ के पूर्ण होने से पहले ही एक पुष्प को गायब कर दिया था तो भगवान राम पुष्प के स्थान पर अपने नयन का अर्पण करने लगे थे तभी मां दुर्गा प्रकट हुई और भगवान राम को विजय का आशीर्वाद दिया।