महाशिवरात्रि 2020: सभी देवों से क्यों और कैसे अलग हैं महादेव, जानें वेशभूषा का रहस्य
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21 फरवरी को महाशिवरात्रि है। शिवभक्तों को इस त्योहार का इंतजार रहता है। भोलेनाथ ऐसे देव हैं जो बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। इनकी वेशभूषा सभी देवी-देवताओं से अलग है। ये न तो सिर पर मुकुट धारण करते है और न ही लजीज भोग ग्रहण करते हैं। सूनसान और बीहड इलाके इनके निवास स्थान हैं। शिवजी के शरीर पर भभूत, सर्प और पिशु होते हैं। शिव का व्यक्तित्व विशाल है। वे काल से परे महाकाल है। सर्वव्यापी और सर्वग्राही हैं। सिर्फ भक्तों के नहीं देवताओं और असुरों के आराध्य हैं। महाशिवरात्रि के मौके पर आइए जानते हैं शिवजी के प्रतीकों के बारे में...
चंद्रमा
शिवजी के मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित रहता है। चंद्रमा मन का कारक होता है। चंद्रमा से मन का नियंत्रण होता है। शिव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था। ये कन्याएं 27 नक्षत्र हैं। इनमें चन्द्रमा रोहिणी से विशेष स्नेह करते थे। इसकी शिकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो, दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे दिया। इस शाप बचने के लिए चन्द्रमा ने भगवान शिव की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने शीश पर स्थान दिया। जहां चन्द्रमा ने तपस्या की थी वह स्थान सोमनाथ कहलाता है। मान्यता है कि दक्ष के शाप से ही चन्द्रमा घटता बढ़ता रहता है।
त्रिशूल
भगवान शिव के हाथों में हमेशा त्रिशूल रहता है। माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब शिव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण शिव जी के तीन शूल यानी त्रिशूल बने। इनके बीच सांमजस्य बनाए बगैर सृष्टि का संचालन कठिन था। इसलिए शिव ने त्रिशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण किया।
डमरू
शिवजी के हाथों में डमरू भी रहता है। धार्मिक मान्यता है कि संगीत के जनक भगवान शिव ही हैं। भगवन शिव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सृष्टि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में ध्वनि जो जन्म दिया। लेकिन यह ध्वनि सुर और संगीत विहीन थी। उस समय भगवान शिव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वनि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ। कहते हैं कि डमरू ब्रह्म का स्वरूप है जो दूर से विस्तृत नजर आता है लेकिन जैसे-जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचते हैं वह संकुचित हो दूसरे सिरे से मिल जाता है और फिर विशालता की ओर बढ़ता है। सृष्टि में संतुलन के लिए इसे भी भगवान शिव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे।
गंगा
भगवान शिव के माथे पर गंगा के विराजमान होने की घटना का संबंध राजा भगीरथ से माना जाता है। कथा है कि भगीरथ ने अपने पूर्वज सगर के पुत्रों को मुक्ति दिलाने के लिए गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था। लेकिन इस कथा के पीछे कई कथाएं हैं जिनसे भगीरथ का प्रयास सफल हुआ।कथा है कि ब्रह्मा की पुत्री गंगा बड़ी मनमौजी थी एक दिन दुर्वासा ऋषि जब नदी में स्नान करने आए तो हवा से उनका वस्त्र उड़ गया और तभी गंगा हंस पड़ी। क्रोधी दुर्वासा ने गंगा को शाप दे दिया कि तुम धरती पर जाओगी और पापी तुम में अपना पाप धोएंगे। इस घटना के बाद भगीरथ का तप शुरू हुआ और भगवान शिव ने भगीरथ को वरदान देते हुए गंगा को स्वर्ग से धरती पर आने के लिए कहा। लेकिन गंगा के वेग से पृथ्वी की रक्षा के लिए शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं में बांधना पड़ा। कथा यह भी है कि गंगा शिव के करीब रहना चाहती थी इसलिए धरती पर उतरने से पहले प्रचंड रूप धारण कर लिया। इस स्थिति को संभालने के लिए शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया।
त्रिपुंड तिलक
शिवजी के माथे पर लगा त्रिपुंड तिलक तीन गुणों का प्रतीक माना जाता है। इसे रज, तम और सत गुणों का भी प्रतीक माना जाता है। लेकिन शिव के माथे पर भभूत की यह तीन रेखाएं कैसे आयी इसकी बड़ी रोचक कथा है।पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजपति के यज्ञ कुंड में सती के आत्मदाह करने के बाद भगवान शिव उग्र रूप धारण कर लेते हैं और सती के देह को कंधे पर लेकर त्रिलोक में हाहाकार मचाने लगते हैं। अंत में विष्णु चक्र से सती के देह को खंडित कर देते हैं। इसके बाद भगवान शिव अपने माथे पर हवन कुंड की राख मलते हैं और इस तरह सती की याद को त्रिपुंड रूप में माथे पर स्थान देते हैं।
नंदी
नंदी और शिव वास्तव में एक ही हैं। शिव ने ही नंदी रूप में जन्म लिया था। कथा है कि शिलाद नाम के ऋषि मोह माया से मुक्त होकर तपस्या में लीन हो गए।इससे इनके पूर्वज और पितरों को चिंता हुई कि इनका वंश समाप्त हो जाएगा। पितरों की सलाह पर शिलाद ने शिव जी की तपस्या करके एक अमर पुत्र को प्राप्त किया जो नंदी नाम से जाना गया। शिव का अंश होने के कारण नंदी शिव के करीब रहना चाहता था। शिव जी की तपस्या से नंदी शिव के गणों में प्रमुख हुए और वृषभ रूप में शिव का वाहन बनने का सौभाग्य प्राप्त किया।
सर्प
शिव के गले में हमेशा सर्पों की माला लिपटी रहती है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने गले में धारण कर सबका कल्याण किया था। कहते हैं कि वासुकी नाग शिव के परम भक्त थे। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने इन्हें नागलोक का राजा बना दिया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांति लिपटे रहने का वरदान दिया।
भभूत
शिवजी के पूरे शरीर में भभूत लिपटी रहती है। भभूत सारे बंधनों से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है यानि मोह और आर्कषण का इसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।