भिक्षा मांगना अध्यात्म के मार्ग पर चलने का साधन है, जानिए इसका महत्व
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अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों को अक्सर भिक्षा मांगते देखा जाता है। भिक्षा मांगना कोई मजबूरी नहीं है। वह इसलिए भिक्षा मांगता है कि वह अपने अहम को छोड़ना चाहता है। यह किसी के भीतर एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। ऐसी परंपरा भी रही है कि साल में एक बार भिक्षा मांगने निकलना चाहिए। ऐसा इसलिए कि आप अपने बारे में बहुत बड़ी-बड़ी बातें सोचना बंद कर सकें।
हो सकता है कि जब आप भिक्षा मांगे, तो लोग आपको भोजन दे दें या भगा दें। इससे फर्क नहीं पड़ता, लेकिन भिखारी बनना एक बड़ी बात है। साधक जब हर चीज को अपनी इंद्रियों की सीमा में रहकर देखते-समझते हैं, तो उसके जीवन का पूरा अनुभव भौतिक है। अध्यात्म का मतलब भौतिकता से परे चीजों या स्थितियों की खोज करना है। अगर कोई भौतिकता से परे कुछ खोजना चाहता है, तो ऐसा नहीं कि आप भौतिकता से इंकार करें, लेकिन आप भौतिकता से परे जाने के इच्छुक हों, यह जरूरी है।
एक बड़ा रहस्य है कि जब कोई बहुत भूखा हो और वह सामने का भोजन किसी को दे दे, तो वह शक्तिशाली हो जाता है। कई तरीके हैं, जो आपकी अपने भौतिक शरीर की सीमाओं से परे जाने में मदद करते हैं। इनमें से ही एक तरीका है परिव्राजक या भिक्षुक। भिक्षा को अपनी गुणवत्ता बढ़ाने और अपनी सीमाओं से परे जाने का एक साधन बनाया जा सकता है। अच्छा होगा कि कुछ समय बिना किसी सहारे के उपवास रखें। बैठकर सोचें कि मैं शरीर नहीं हूं। पेट भरा होने पर कहें, यह तो मामूली बात है। पर जब आप भूखे हों, तो आप शरीर होते हैं। उस वक्त अगर अपनी जागरूकता संभाल सकें, शालीनता रखें, तो आप कुछ और बन जाते हैं।
अमर उजाला के कल्पवृक्ष पन्ने से साभार