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कालरात्रि और मां काली में क्या समानता है?

Wed, 01 Oct 2014 03:29 PM IST
Updated Wed, 01 Oct 2014 03:29 PM IST
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kali and kalratri puja in navratra

दुर्गा के नौ रुपों में सातवां रुप है देवी कालरात्रि का इसलिए नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा होती है। शास्त्रों में बताया गया है कि कालरात्रि का स्वरूप काल को भी भयभीत करने वाला है।

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स्याह रात्रि के समान माता का स्वरूप काला है। कालारात्रि माता गले में विद्युत की माला धारण करती हैं। इनके बाल खुले हुए हैं और गर्दभ की सवारी करती हैं।

माता के हाथ में कटा हुआ सिर है जिससे रक्त टपकता रहता है। भयंकर रूप होते हुए भी माता भक्तों के लिए कल्याणकारी है। देवी भाग्वत् में कालरात्रि को आदिशक्ति का तमोगुण स्वरूप बताया गया। कालरात्रि माता को काली और शुभंकरी भी कहा जाता है।
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क्या काली और कालरात्रि एक हैं?

kali and kalratri puja in navratra

कालरात्रि माता के विषय में कहा जाता है कि यह दुष्टों के बाल पकड़कर खड्ग से उसका सिर काट देती हैं। रक्तबीज से युद्घ करते समय मां काली ने भी इसी प्रकार से रक्तबीज का वध किया था। मां काली के युद्घ करने का यह तरीका दर्शाता है कि काली और कालरात्रि एक ही हैं। कालरात्रि माता भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी कही जाती है।


जीवों में मोह माया का कारण भी मां कालरात्रि देवी हैं। दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में बताया गया है कि भगवान विष्णु जब सो रहे थे तब उनके कान के मैल से दो भयंकर असुर मधु और कैटभ उत्पन्न हुए। ये दोनों असुर ब्रह्मा जी को मारना चाहते थे। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की योगनिद्रा की आराधना की।

ब्रह्मा जी भगवान विष्णु की योगनिद्रा को कालरात्रि, मोहरात्रि के रूप में ध्यान किया। ब्रह्मा जी की वंदना से देवी कालरात्रि ने भगवान विष्णु को निद्रा से जगाया। भगवान विष्णु ने मधु-कैटभ का वध करके ब्रह्मा जी की रक्षा की।

माता कालरात्रि की पूजा से लाभ

kali and kalratri puja in navratra

जो व्यक्ति देवी कालरात्रि अपने भक्त के लिए संसार का सब सुख सुलभ कर देती है। माता के भक्त संसार में रहते हुए भी मोहमाया से मुक्त हो जाते हैं और मृत्यु के बाद इन्हें उत्तम लोक में स्थान प्राप्त होता है।

देवी कालरात्रि का ध्यान मंत्र:

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥

दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥

महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥

सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्।।


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