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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   kalashtami 2021 July date importance and know the katha story of kalashtami vrat

kalashtmi july 2021: इस दिन किया जाता है शिव जी के रुद्रावतार भगवान कालभैरव का पूजन, जानिए कालाष्टमी की पौराणिक कथा

Mon, 28 Jun 2021 01:15 PM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Shashi Shashi Updated Mon, 28 Jun 2021 01:15 PM IST
सार

इस बार आषाढ़ मास में 01 जुलाई 2021 को कालाष्टमी का व्रत किया जाएगा। इसे कालाष्मी या भैरवष्टमी भी कहा जाता है। कालाष्टमी की पौराणिक कथा से जानिए कैसे हुआ भगवान शिव के रुद्रावतार काल भैरव का जन्म।

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कालाष्टमी 2021

विस्तार

हिंदी पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्मी का व्रत किया जाता है। इस बार आषाढ़ मास में 01 जुलाई 2021 को कालाष्टमी का व्रत किया जाएगा। इसे कालाष्मी या भैरवाष्टमी भी कहा जाता है। यह तिथि भगवान कालभैरव के समर्पित की जाती है। श्वान (कुत्ता) को भगवान कालभैरव का वाहन माना जाता है, इसलिए कालाष्मी के दिन श्वान को भोजन करवाने से भगवान काल भैरव की असीम कृपा प्राप्त होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान काल भैरव शिव जी का रुद्रावतार हैं। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। भगवान भैरव की कृपा प्राप्त करने हेतु कालाष्मी का दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन विधि-विधान से इनका पूजन और व्रत करने से भय, नकारात्मक शक्तियों, ग्रह बाधा और शत्रुओं से मुक्ति प्राप्त होती है। तो आइए जानते हैं कालाष्टमी व्रत की पौराणिक कथा।

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कालाष्टमी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों में श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। जब इस बात पर बहस बढ़ गई, तो इसका समाधान खोजने के लिए सभी देवताओं को बुलाकर बैठक की गई।

 

इसके बाद सभी से यह प्रश्न किया गया कि तीनों में श्रेष्ठ कौन है? इस पर सभी देवों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए और उत्तर खोज लिया। उस बात का समर्थन शिवजी और विष्णु ने तो किया, परंतु ब्रह्माजी ने शिवजी को अपशब्द कह दिए। इस बात पर शिव जी को क्रोध आ गया।

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इसके बाद शिवजी ने उस क्रोध में अपने रूप से भैरव को जन्म दिया। भगवान भैरव के अवतार का वाहन काला कुत्ता है। इनके एक हाथ में छड़ी है। इस अवतार को 'महाकालेश्वर' व दंडाधिकारी के नाम से भी जाना जाता है। शिव जी के इस स्वरुप को देखकर देवता भी भयभीत हो गए। 

 

भगवान शिव के रुद्रावतार भगवान भैरव ने क्रोध में ब्रह्माजी के 5 मुखों में से 1 मुख को काट दिया, तब से ब्रह्माजी के पास 4 मुख ही हैं। ब्रह्माजी के सिर को काटने के कारण भगवान भैरव पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया। 

 

इसके बाद भगवान शिव ने भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति का उपाय बताते हुए उन्हें पृथ्वी लोग पर जाकर प्रायश्चित करने को कहा। इस तरह से कई वर्षों के पश्चात अंत में जाकर काशी में इनकी यात्रा पूर्ण हुई। जिसके बाद ये काशी में ही स्थापित हो गए। इस तरह से ब्रह्महत्या के पाप का प्रायश्चित करने के कारण इनका नाम 'दंडपाणी' भी पड़ा।

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