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अजा एकादशी का महत्व: राजा हरिश्चंद्र की कथा से जानिए एकादशी व्रत का दिव्य फल

Mon, 07 Sep 2026 12:39 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद
अनीता जैन ,वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 07 Sep 2026 12:39 PM IST
सार

Aja Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में अजा एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रत रखने और कथा सुनने से पुण्य लाभ की प्राप्ति होती है। 

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Aja Ekadashi 2026 Katha Importance Fast Brings Happiness and Prosperity in Life
अजा एकादशी व्रत कथा - फोटो : adobe stock

विस्तार

Aja Ekadashi 2026: सृष्टि के पालनहार भगवान श्री नारायण ने मनुष्य के कल्याण और पापों से मुक्ति के लिए अपने स्वरूप से पुरुषोत्तम मास की एकादशियों सहित कुल 26 एकादशियों को प्रकट किया। शास्त्रों में सभी एकादशियों को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होकर उसे अंततः वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है।
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अजा एकादशी का दिव्य महत्व और पुण्यफल
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अजा एकादशी के महात्म्य का वर्णन किया था। उन्होंने बताया कि जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान ऋषिकेश अर्थात श्री विष्णु का पूजन करता है, वह सांसारिक जीवन में सुख प्राप्त करने के बाद विष्णुलोक को प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार अजा एकादशी का पुण्यफल अश्वमेघ यज्ञ, तीर्थों में दान-स्नान, हजारों वर्षों तक तपस्या करने तथा कन्यादान से प्राप्त होने वाले पुण्य से भी अधिक माना गया है। यह व्रत मन को पवित्र करता है, बुद्धि को स्थिरता प्रदान करता है और मनुष्य को धर्म तथा सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
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ऐसे करें भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन
अजा एकादशी के दिन भक्त को सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। पूजा में गोपी चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतु फल, तिल और मंजरी सहित तुलसी दल अर्पित करना शुभ माना जाता है।लदिनभर भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार निराहार रहकर व्रत किया जा सकता है और आवश्यकता होने पर शाम के समय फलाहार किया जा सकता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है।
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राजा हरिश्चंद्र की करुण कथा, जिसने जगाया धर्म का प्रकाश
पौराणिक काल में राजा हरिश्चंद्र अत्यंत वीर, प्रतापी और सत्यवादी चक्रवर्ती राजा थे। प्रभु की इच्छा से एक दिन उन्होंने स्वप्न में अपना संपूर्ण राज्य एक ऋषि को दान कर दिया। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र तक को बेचने के लिए विवश होना पड़ा। स्वयं राजा को एक चाण्डाल का दास बनकर कफन लेने का कार्य करना पड़ा।इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा। कई वर्षों तक इस कठिन जीवन को सहने के बाद वह अपने कर्म और परिस्थितियों से अत्यंत दुखी हो गए। उनके मन में यही प्रश्न उठता रहता था कि आखिर किस प्रकार इस नीच कर्म और दुख से मुक्ति मिलेगी।

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एक दिन इसी चिंता में बैठे राजा हरिश्चंद्र के पास महर्षि गौतम पहुंचे। राजा ने उन्हें प्रणाम कर अपनी पूरी दुखभरी कथा सुनाई। राजा की दशा देखकर महर्षि गौतम भी अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने कहा कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा एकादशी है। यदि राजा विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करें और रात्रि में जागरण करें तो उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे।

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अजा एकादशी के प्रभाव से लौटा राजा का खोया वैभव
महर्षि गौतम के बताए अनुसार अजा एकादशी आने पर राजा हरिश्चंद्र ने श्रद्धा और विधिपूर्वक उपवास किया तथा रात्रि जागरण किया। व्रत के प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए और उनके जीवन में फिर सुख का प्रकाश फैल गया।
कथा के अनुसार उसी समय स्वर्ग में देवताओं के नगाड़े बजने लगे और आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। राजा ने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवराज इंद्र सहित अनेक देवताओं को उपस्थित देखा। उनका मृत पुत्र पुनः जीवित हो गया और उनकी पत्नी राजसी वस्त्रों एवं आभूषणों से सुसज्जित दिखाई दीं। अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ राज्य भी पुनः प्राप्त हो गया। 
 
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