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Tulsi Vivah 2024: जानिए क्यों किया भगवान विष्णु ने तुलसी संग विवाह? क्या है तुलसी शालिग्राम पूजन का महत्व

Tue, 12 Nov 2024 11:44 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 12 Nov 2024 11:44 AM IST
सार

Tulsi Shaligram Vivah Story: हिंदू धर्म में देवउठनी एकादशी का विशेष महत्व होता है। प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी को श्रद्धालु पूरे विधान से तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न कराते हैं। इसी दिन से मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।

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Tulsi Vivah Dev Uthani Ekadashi 2024 Vrat Katha Tulsi Shaligram Vivah Story In Hindi
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विस्तार

Tulsi Shaligram Vivah Story: आज देवउठनी एकादशी है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ बताया गया है। प्रत्येक एकादशी परमेश्वर श्री विष्णु को समर्पित है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा से जागते हैं और इस दिन से ही मांगलिक कार्यों की भी शुरुआत हो जाती है। लक्ष्मी स्वरूपा तुलसी भगवान विष्णु को अति प्रिय हैं। इस दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का विवाह भी तुलसी के साथ कराया जाता है। तुलसी और शालिग्राम का भी पूजन करते हैं और मनोकामना मांगते हैं।

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तुलसी-शालिग्राम पूजन की महिमा
पुराणों में शालिग्राम को ब्रह्माण्डभूत श्री नारायण का प्रतीक माना जाता है। प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी को श्रद्धालु पूरे विधान से तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न कराते हैं। इसी दिन से मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। पदमपुराण  के अनुसार जो व्यक्ति शालिग्राम शिला का दर्शन करता है उसके सामने मस्तक झुकाता है ,स्न्नान कराता है और पूजन करता है वह कोटि यज्ञों के समान पुण्य तथा कोटि गोदानों का फल पाता है। इनके स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन और प्रणाम करने पर अनेक पाप दूर हो जाते हैं। 
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जिस स्थान पर शालिग्राम और तुलसी होते हैं वहां भगवान श्री हरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। भगवान शिव ने शालिग्राम की महिमा का गान करते हुए कहा है कि करोड़ों कमल पुष्पों से मेरी पूजा करने पर जो फल प्राप्त होता है वही शालिग्राम शिला के पूजन से कोटिगुना होकर मिलता है। मेरे कोटि-कोटि लिंगों का दर्शन, पूजन और स्तवन करने से जो फल मिलता है वह एक ही शालिग्राम के पूजन से प्राप्त हो जाता है ।जहां इनका पूजन होता है वहां पर किया हुआ दान, स्नान काशी से सौ गुना अधिक फल देने वाला माना गया है। शालिग्राम, तुलसी और शंख को जो व्यक्ति श्रद्धा से सुरक्षित रखता है उससे भगवान श्री हरि बहुत प्रेम करते हैं।

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पौराणिक कथा
तुलसी और शालिग्राम के विवाह से जुड़ी कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताई गई है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में तुलसी जिनका एक नाम वृंदा है, शंखचूड़ नाम के असुर की पत्नी थी। शंखचूड़ दुराचारी और अधर्मी था। देवता और मनुष्य सभी इस असुर से त्रस्त थे। तुलसी के सतीत्व के कारण सभी देवता मिलकर भी शंखचूड़ का वध नहीं कर पा रहे थे। सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु और शिवजी के पास पहुंचे और उनसे दैत्य को मारने का उपाय पूछा। उस समय भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण करके तुलसी का सतीत्व भंग कर दिया। जिससे शंखचूड़ की शक्ति खत्म हो गई और शिवजी ने उसका वध कर दिया। बाद में जब तुलसी को ये बात पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। विष्णुजी ने तुलसी के श्राप को स्वीकार किया और कहा कि तुम पृथ्वी पर पौधे और नदी के रूप में रहोगी और तुम्हारी पूजा भी की जाएगी। मेरे भक्त तुम्हारा और मेरा विवाह करवाकर पुण्य लाभ प्राप्त करेंगे। उस दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी का दिन था। तुलसी नेपाल की गंडकी और पौधे के रूप में आज भी धरती पर हैं। गंडकी नदी में ही शालिग्राम मिलते हैं।

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