6 अक्तूबर को मोक्ष प्रदान करने वाली इंदिरा एकादशी, जानिए महत्व और पूजाविधि
इन्दिरा एकादशी का सबसे बड़ा धार्मिक महत्व पितरों की मुक्ति से जुड़ा है। शास्त्रों में माना गया है कि इस दिन किए गए व्रत, जप, दान और पुण्य कर्मों का फल पितरों को अर्पित करने से उन्हें सद्गति मिलती है।
विस्तार
पितृदोष से मुक्ति और पितरों से संबंधित कष्टों के निवारण के लिए भी अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली इन्दिरा एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यदि किसी पूर्वज को पूर्व जन्म के जाने-अनजाने किए गए पाप कर्मों के कारण कष्ट भोगना पड़ रहा हो, तो इन्दिरा एकादशी का व्रत कर उसके नाम से दान-पुण्य करने से उसे सद्गति प्राप्त होती है। पद्म पुराण में इस एकादशी के महात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि इसका पुण्य पितरों को समर्पित करने से नरक में पड़े पितृ भी वहां से मुक्त होकर विष्णुधाम को प्राप्त कर सकते हैं। नीच योनि में भटक रहे पितरों को भी यह व्रत सद्गति प्रदान करने वाला माना गया है। श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करने वाले व्यक्ति के पितरों की कई पीढ़ियों का उद्धार होने के साथ स्वयं व्रती के लिए भी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
1. पितरों के उद्धार का खुलता है मार्ग
इन्दिरा एकादशी का सबसे बड़ा धार्मिक महत्व पितरों की मुक्ति से जुड़ा है। शास्त्रों में माना गया है कि इस दिन किए गए व्रत, जप, दान और पुण्य कर्मों का फल पितरों को अर्पित करने से उन्हें सद्गति मिलती है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में आने वाली इस एकादशी को विशेष फलदायी माना गया है। भक्तिभाव से किया गया यह व्रत पितृदोष और पितरों से जुड़े कष्टों के निवारण के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
2. संकल्प से शुरू करें एकादशी का व्रत
इन्दिरा एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प के समय भगवान नारायण से प्रार्थना करें—'कमलनयन भगवान नारायण! आज मैं समस्त भोगों से अलग होकर निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत! मैं आपकी शरण में हूं।' इस दिन व्रती को संयम और सात्विकता के साथ अपना समय भगवान के भजन-कीर्तन और हरिनाम स्मरण में बिताना चाहिए। शास्त्रों में इस अवसर पर आलस्य त्यागकर भगवान विष्णु की आराधना करने का विशेष महत्व बताया गया है।
3. शालग्राम पूजा और पितरों के नाम श्राद्ध
इन्दिरा एकादशी पर भगवान विष्णु के शालग्राम स्वरूप की पूजा का विधान बताया गया है। भगवान शालग्राम को पहले पंचामृत से स्नान कराएं और इसके बाद गंगाजल मिले पवित्र जल से अभिषेक करें। पूजा में पीला चंदन, अबीर, गुलाल, अक्षत, मौली, पुष्प और तुलसी पत्र अर्पित करें। भगवान को भोग लगाने के बाद आरती करें और इन्दिरा एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें। मध्याह्न के समय भगवान विष्णु की प्रसन्नता और पितरों की सद्गति के लिए शालग्राम शिला के समक्ष श्राद्ध करने का विधान है। पितरों के लिए निकाला गया भोजन गाय को खिलाने के बाद परिवार के भाई-बन्धु, नाती-पुत्र आदि को भोजन कराएं। इसके बाद स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करने की परंपरा बताई गई है।
4. द्वादशी पर पूजा, भोजन और दक्षिणा का विधान
एकादशी व्रत के अगले दिन द्वादशी तिथि पर प्रातःकाल भगवान पद्मनाभ की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन करवाकर यथाशक्ति दक्षिणा और दान देना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत का पारण और दान-पुण्य विधिपूर्वक करने से एकादशी का पुण्य पूर्ण होता है।
नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी से लेकर करवा चौथ तक, यहां देखें अक्तूबर माह के सभी व्रत-त्योहारों की लिस्ट
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है