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Mohini Ekadashi Vrat Katha: जब स्वर्भानु बना राहु-केतु, जानिए मोहिनी एकादशी की चमत्कारी व्रत कथा
Mon, 27 Apr 2026 09:59 AM IST
Vinod Shukla
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
Published by: Vinod Shukla
Updated Mon, 27 Apr 2026 09:59 AM IST
सार
Mohini Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्व होता है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी आज है, जिसे मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं मोहिनी एकादशी व्रत की कथा
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मोहिनी एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Mohini Ekadashi Vrat Katha: आज, सोमवार 27 अप्रैल को मोहिनी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोहिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन मोहिनी एकादशी को विशेष रूप से मोह, पाप और दुःखों से मुक्ति दिलाने वाला व्रत माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अंततः उसे भगवान विष्णु के परम धाम वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।
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त्रेता युग में श्रीराम ने अपनाया यह पावन व्रत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्रीराम एवं विष्णुजी के मोहिनी स्वरूप का पूजन-अर्चन किया जाता है। पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को मोहिनी एकादशी का महत्व बताते हुए कहा कि त्रेता युग में महर्षि वशिष्ठ के कहने पर परम प्रतापी श्रीराम ने इस व्रत का पालन किया था।
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इस व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ बताया गया है, क्योंकि यह न केवल समस्त पापों का नाश करता है बल्कि जीवन के हर प्रकार के दुःखों को भी समाप्त करता है। इसके प्रभाव से मनुष्य भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त कर मोह-माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है और अंत में वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है।
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मोहिनी अवतार और समुद्र मंथन की कथा
मोहिनी एकादशी की कथा का संबंध समुद्र मंथन की प्रसिद्ध पौराणिक घटना से जुड़ा हुआ है। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तब अंत में अमृत कलश प्रकट हुआ। अमृत को देखकर असुरों ने बलपूर्वक उसे अपने अधिकार में ले लिया और देवताओं को वंचित कर दिया। इस स्थिति को देखकर सृष्टि के संतुलन हेतु भगवान विष्णु ने एक अद्भुत योजना बनाई। उन्होंने एक अत्यंत सुंदर और मोहक स्त्री का रूप धारण किया, जिसे ‘मोहिनी’ कहा गया। मोहिनी का रूप इतना आकर्षक था कि सभी असुर उस पर मोहित हो गए और अमृत वितरण का कार्य उसी को सौंप दिया। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में चतुराई से सबसे पहले देवताओं को अमृत पिलाना आरंभ किया और असुरों को भ्रमित रखा। इस प्रकार देवताओं की रक्षा संभव हो सकी और धर्म की विजय हुई।
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राहु-केतु की उत्पत्ति का रहस्य
इसी अमृत वितरण के दौरान एक असुर स्वर्भानु ने देवता का रूप धारण कर अमृत प्राप्त करने का प्रयास किया। वह देवताओं की पंक्ति में जाकर बैठ गया और जैसे ही अमृत पीने लगा, तभी सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान कर ली और संकेत किया। तुरंत ही भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। किंतु अमृत की एक बूंद पी लेने के कारण वह अमर हो चुका था। परिणामस्वरूप उसका सिर ‘राहु’ और धड़ ‘केतु’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कालांतर में इन्हें नवग्रहों में स्थान प्राप्त हुआ। यह कथा न केवल मोहिनी एकादशी के महत्व को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए भगवान स्वयं विभिन्न रूप धारण कर संतुलन स्थापित करते हैं।
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