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Kharmas 2025: खरमास में सूर्यदेव को ऐसे करें प्रसन्न, बनेंगे सभी बिगड़े काम

Wed, 12 Mar 2025 04:33 AM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Wed, 12 Mar 2025 04:33 AM IST
सार

Kharmas 2025: वर्तमान में साल 2025 का तीसरा महीना यानी मार्च जारी है, जो ज्योतिष दृष्टि से बेहद खास है। इस मास में होली, चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण, शनि राशि परिवर्तन के साथ-साथ खरमास लगने वाला है। 

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Kharmas 2025 date and significance know Surya Chalisa Lyrics in hindi
Kharmas 2025 - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

Kharmas 2025: वर्तमान में साल 2025 का तीसरा महीना यानी मार्च जारी है, जो ज्योतिष दृष्टि से बेहद खास है। इस मास में होली, चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण, शनि राशि परिवर्तन के साथ-साथ खरमास लगने वाला है। इसे हिंदू धर्म में बेहद महत्वपूर्ण समय माना जाता है, क्योंकि इस अवधि में सभी तरह के शुभ कार्यों को करना वर्जित होता है। 

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बता दें, जब भी सूर्य देव धनु और मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तो खरमास लगता है। यह लगभग 30 दिनों तक रहता है। मान्यता है कि सूर्य देव गुरु बृहस्पति के घर जाते ही अपने तेज को कम करते हैं, इसलिए खरमास में सूर्य की स्थिति कमजोर मानी जाती है। ऐसे में सूर्य की स्थिति कमजोर होने पर शादी-विवाह, सगाई, मुंडन, यात्राएं, खरीदारी व किसी भी नए काम की शुरुआत करना अशुभ होता है।

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इस साल 14 मार्च 2025 से खरमास की शुरुआत हो रही है। यह समय सूर्य देव की पूजा-अर्चना और दान-पुण्य के लिए शुभ माना जाता है। इस अवधि में सूर्य चालीसा का पाठ करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं। इतना ही नहीं कुंडली में भी उनकी स्थिति मजबूत होती हैं, जिसके प्रभाव से व्यक्ति को हर क्षेत्र में मान-सम्मान की प्राप्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती हैं। आइए इस चालीसा के बारे में जानते हैं

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श्री सूर्य चालीसा
 दोहा
 
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
 
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
 
विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
 
सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।
 
मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।
 
मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
 
आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
 
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
 
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
 
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
 
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
 
भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
 
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
 
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
 
जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।
 
सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
 
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।
 
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।
 
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।
 
परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।
 
भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
 
दोहा
 भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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