Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद क्यों है खास, जानें किसको लगता है पहला भोग
First Bhog in Jagannath Temple: भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का एक रूप माना जाता है, जो भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार हैं। ओडिशा राज्य के पुरी शहर में स्थित जगन्नाथ मंदिर अत्यंत पवित्र और भव्य धार्मिक स्थल है। भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का एक रूप माना जाता है, जो भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार हैं। ओडिशा राज्य के पुरी शहर में स्थित जगन्नाथ मंदिर अत्यंत पवित्र और भव्य धार्मिक स्थल है।
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Jagannath Temple Mahaprasad: भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का एक रूप माना जाता है, जो भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार हैं। ओडिशा राज्य के पुरी शहर में स्थित जगन्नाथ मंदिर अत्यंत पवित्र और भव्य धार्मिक स्थल है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मृत्यु के पश्चात अपनी आत्मा को इसी मंदिर की मूर्ति में स्थापित किया था। यही कारण है कि यह मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
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जगन्नाथ मंदिर न केवल अपनी आध्यात्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी अनोखी परंपराएं और रथ यात्रा उत्सव भी पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। हर वर्ष लाखों भक्त भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विशाल रथों को खींचने के लिए पुरी पहुंचते हैं। यह मंदिर हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है और इसका ऐतिहासिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है।
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भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति लकड़ी से बनाई जाती है, जो अन्य देवी-देवताओं की पत्थर या धातु की मूर्तियों से अलग है। इन्हें "नीलमाधव" के नाम से भी जाना जाता है। भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां भी विराजमान हैं। इन मूर्तियों को हर 12 साल बाद एक विशेष परंपरा के तहत बदला जाता है, जिसे "नवकलेवर" या "नवकलश" उत्सव कहा जाता है। इस प्रक्रिया में नई मूर्तियां पुराने नियमों और विधियों के अनुसार तैयार की जाती हैं।
भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद
पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में जो भोग अर्पित किया जाता है, उसे "महाप्रसाद" कहा जाता है। यह प्रसाद भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को चढ़ाने के बाद भक्तों में बांटा जाता है। महाप्रसाद को बेहद पवित्र माना जाता है और इसे खाने से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
महाप्रसाद न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इसे ग्रहण करने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है, मन शांत होता है और नकारात्मक विचार दूर हो जाते हैं। श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर का आशीर्वाद मानकर ग्रहण करते हैं।
भगवान जगन्नाथ मंदिर की अनोखी भोग परंपरा
भगवान जगन्नाथ का भोग सबसे पहले माता पार्वती के रूप में मानी जाने वाली विमला देवी को अर्पित करने की परंपरा कई धार्मिक और पौराणिक कारणों से जुड़ी है। विमला देवी का मंदिर जगन्नाथ मंदिर के परिसर के अंदर ही स्थित है और उन्हें भगवान जगन्नाथ की बहन माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, विमला देवी भगवान जगन्नाथ की अत्यंत भक्त थीं और सदैव उनकी सेवा में लगी रहीं। उनकी इस अटूट भक्ति और प्रेम को सम्मान देते हुए, यह परंपरा चली आ रही है कि भगवान के भोग का पहला भाग विमला देवी को अर्पित किया जाए। ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ की पूजा और भोग तभी पूर्ण होता है जब पहले यह प्रसाद विमला देवी को दिया जाता है। इसलिए उनकी पूजा भगवान जगन्नाथ की पूजा के समान महत्वपूर्ण मानी जाती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।