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Holi 2020: भद्राकाल में भूलकर भी न करें होलिका दहन, योग से लेकर शुभ मुहूर्त तक जानें सबकुछ
Mon, 02 Mar 2020 04:08 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Mon, 02 Mar 2020 04:08 PM IST
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होली 2020
- फोटो : अमर उजाला
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इस बार होलिका दहन 9 मार्च को है। होलाष्टक 3 मार्च से प्रारंभ होंगे। भद्राकाल में होलिका दहन नहीं किया जाना चाहिए। पद्मेश इंस्टीट्यूट आफ वैदिक साइंसेस के अध्यक्ष पंडित केए दुबे पद्मेश ने बताया कि 9 मार्च को पूर्णिमा 23 घंटे 18 मिनट तक है। पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र रात के एक बजकर 9 मिनट तक और भद्रा एक बजकर 13 मिनट तक है।
इस दिन यायिजय योग भी है। इस दिन सूर्यास्त के 48 मिनट बाद से रात के 11 बजकर 27 मिनट तक होलिका दहन श्रेष्ठ रहेगा। इसके अलावा जो लोग साधना करते हैं, उनके लिए रात के एक बजकर 50 मिनट से 2 बजकर 47 मिनट तक श्रेष्ठ है। होलाष्टक 3 मार्च से शुरू हो रहा है।
होली पर्व मनाए जाने के अलग-अलग घटनाक्रम शास्त्रों में बताए गए हैं। वैदिक काल में इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने क्रोध में कामदेव को इस दिन भस्म कर दिया था। एक और मान्यता है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।
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इस दिन यायिजय योग भी है। इस दिन सूर्यास्त के 48 मिनट बाद से रात के 11 बजकर 27 मिनट तक होलिका दहन श्रेष्ठ रहेगा। इसके अलावा जो लोग साधना करते हैं, उनके लिए रात के एक बजकर 50 मिनट से 2 बजकर 47 मिनट तक श्रेष्ठ है। होलाष्टक 3 मार्च से शुरू हो रहा है।
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होली पर्व मनाए जाने के अलग-अलग घटनाक्रम शास्त्रों में बताए गए हैं। वैदिक काल में इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने क्रोध में कामदेव को इस दिन भस्म कर दिया था। एक और मान्यता है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।
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होलाष्टक से यह है तात्पर्य
होली के आठ दिन पूर्व से होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। होलाष्टक शब्द होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ होता है होली के आठ दिन। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक रहता है।
अष्टमी तिथि से शुरू होने कारण भी इसे होलाष्टक कहा जाता है। हमें होली आने की पूर्व सूचना होलाष्टक से मिलती है। इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं।
होली के आठ दिन पूर्व से होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। होलाष्टक शब्द होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ होता है होली के आठ दिन। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक रहता है।
अष्टमी तिथि से शुरू होने कारण भी इसे होलाष्टक कहा जाता है। हमें होली आने की पूर्व सूचना होलाष्टक से मिलती है। इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं।
इस दौरान उग्र रहते हैं ग्रह
होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्त्रस्, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं। इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है। जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं। जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा और वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं। उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए। होलाष्टक प्रारंभ होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी। साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था
यह करते हैं होलाष्टक में
माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियां शुरू हो जाती है। होलाष्टक आरंभ होते ही दो डंडों को स्थापित किया जाता है। इसमें एक होलिका का प्रतीक है और दूसरा प्रह्लाद से संबंधित है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है।
होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्त्रस्, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं। इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है। जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं। जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा और वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं। उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए। होलाष्टक प्रारंभ होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी। साथ ही वहां पर होलिका का डंडा लगा दिया जाता था
यह करते हैं होलाष्टक में
माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियां शुरू हो जाती है। होलाष्टक आरंभ होते ही दो डंडों को स्थापित किया जाता है। इसमें एक होलिका का प्रतीक है और दूसरा प्रह्लाद से संबंधित है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है।
होली से जुड़ी कथाएं
कहा जाता है जब प्रह्लाद को नारायण भक्ति से विमुख करने के सभी उपाय निष्फल होने लगे तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बंदी बना लिया और यातनाएं देने लगा। उसे मारने के लिए रोज अनेक उपाय किए जाने लगे लेकिन भगवत भक्ति में लीन प्रहलाद हमेशा जीवित बच जाते थे। इस तरह सात दिन बीत गए। आठवें दिन भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी देख बहन होलिका (जिसे ब्रह्मा द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान था) ने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव रखा।
होलिका जैसे ही भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठी तो वहीं जलने लगी। प्रहलाद पुन: जीवित बच गए जबकि होलिका जल गई। इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुन: जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।
कहा जाता है जब प्रह्लाद को नारायण भक्ति से विमुख करने के सभी उपाय निष्फल होने लगे तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बंदी बना लिया और यातनाएं देने लगा। उसे मारने के लिए रोज अनेक उपाय किए जाने लगे लेकिन भगवत भक्ति में लीन प्रहलाद हमेशा जीवित बच जाते थे। इस तरह सात दिन बीत गए। आठवें दिन भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी देख बहन होलिका (जिसे ब्रह्मा द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान था) ने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव रखा।
होलिका जैसे ही भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठी तो वहीं जलने लगी। प्रहलाद पुन: जीवित बच गए जबकि होलिका जल गई। इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुन: जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।