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Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2025: द्विजप्रिय चतुर्थी आज, जानिए पूजा विधि, महत्व और कथा

Sun, 16 Feb 2025 07:06 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Sun, 16 Feb 2025 07:06 AM IST
सार

द्विज प्रिय चतुर्थी को भगवान गणेश का प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन गणेश पूजन से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह व्रत संतान सुख और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने के लिए किया जाता है।

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Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2025 Puja Vidhi Shubh Muhurat Significance Katha And Importance
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विज प्रिय चतुर्थी कहा जाता है। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2025: हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि का विशेष महत्व है और वर्ष भर में कई प्रकार की चतुर्थियां मनाई जाती हैं। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विज प्रिय चतुर्थी कहा जाता है। इस साल यह व्रत 16 फरवरी को किया जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की विशेष रूप से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को रखने से व्यक्ति को संतान सुख, विद्या, बुद्धि और समृद्धि प्राप्त होती है।
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व्रत का महत्व
द्विज प्रिय चतुर्थी को भगवान गणेश का प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन गणेश पूजन से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह व्रत संतान सुख और परिवार में सुख-शांति बनाए रखने के लिए किया जाता है। विशेष रूप से वे लोग इस व्रत को करते हैं जो अपने जीवन में विद्या, बुद्धि और ऐश्वर्य की कामना रखते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत को करने से समस्त कष्ट दूर होते हैं और व्यक्ति को सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। इसके अलावा, इस व्रत को करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और उसका मन शांत रहता है।
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पूजा विधि
इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा से पहले संकल्प लिया जाता है कि व्रती विधिपूर्वक व्रत करेंगे और भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को एक चौकी पर स्थापित करें। पूजा में भगवान गणेश को लाल फूल, दूर्वा, मोदक, लड्डू, चंदन, फल, पंचामृत और धूप-दीप अर्पित करें। गणेश मंत्रों का जाप करना इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है। "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने से मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। पूजा के बाद कथा का श्रवण करना आवश्यक होता है।

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द्विज प्रिय चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार शिव और पार्वती के बीच चौपड़ का खेल शुरू हुआ लेकिन इस उस समय वहां उन दोनों के अलावा कोई और मौजूद नहीं था जो इस खेल के निर्णायक की भूमिका निभा सके। इस समस्या का समाधान निकालते हुए शिवजी और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। शंकर-पार्वती जी ने मिट्टी से बने बालक को इस खेल में हार-जीत का निर्णय लेने का आदेश दिया।माता पार्वती और भोलेनाथ के बीच चौपड़ का खेल शुरू हुआ। हर चाल में देवी पार्वती ने शिव जी को मात दे दी। इसी तरह खेल चलता रहा लेकिन एक बार बालक ने गलती से माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। देवी बालक की इस गलती से क्रोधित हो उठीं और गुस्से में उन्होंने बालक को लंगड़ा होने का श्राप दे दिया। 

बालक ने अपनी भूल पर मां पार्वती से बार-बार माफी मांगी, लेकिन देवी ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं लिया जा सकता। बालक ने माता से इसका उपाय जाना। देवी पार्वती ने बालक को श्राप से मुक्ति का उपाय बताते हुए कहा कि फाल्गुन माह की संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के द्विजप्रिय रूप की विधि विधान से उपासना करो। बालक ने ऐसा ही किया और गौरी पुत्र गणेश बालक की सच्ची श्रद्धा देखकर बेहद प्रसन्न हुए। बालक श्राप मुक्त हो गया, उसके पैर पूरी तरह स्वस्थ हो गए और वह सुख-शांति से अपना जीवन यापन करने लगा।

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