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हरितालिका तीज में मिट्टी की शिव-पार्वती प्रतिमा ही क्यों बनाई जाती है? जानें धार्मिक महत्व और पूजा विधि

Fri, 11 Sep 2026 03:27 PM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Fri, 11 Sep 2026 03:27 PM IST
सार

हरतालिका तीज की पूजा से जुड़ी एक परंपरा इसे अन्य व्रतों से खास बनाती है। इस दिन महिलाएं तैयार प्रतिमा खरीदने के बजाय अपने हाथों से मिट्टी या बालू से शिवलिंग के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की आकृति तैयार करती हैं। आइए जानते हैं कि आखिर पूजा में मिट्टी की प्रतिमा क्यों बनाते हैं।

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Hartalika Teej Mitti or balu parthiv shivling puja importance niyam mitti se shivling banane ka mahatva
हरतालिका तीज - फोटो : AI

हरतालिका तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं मनपसंद जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए हरतालिका तीज का व्रत करती हैं। वर्ष 2026 में यह पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा।



हरतालिका तीज की पूजा से जुड़ी एक परंपरा इसे अन्य व्रतों से खास बनाती है। इस दिन कई स्थानों पर महिलाएं तैयार प्रतिमा खरीदने के बजाय अपने हाथों से मिट्टी या बालू से शिवलिंग के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की आकृति तैयार करती हैं। लेकिन आखिर पूजा में मिट्टी की प्रतिमा बनाने की परंपरा क्यों है और इसका धार्मिक महत्व क्या है?

Hartalika Teej Mitti or balu parthiv shivling puja importance niyam mitti se shivling banane ka mahatva
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है परंपरा - फोटो : Instagram

माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मिट्टी या बालू से शिवलिंग बनाने की परंपरा माता पार्वती की कठोर साधना से जुड़ी हुई है। हरतालिका तीज की कथा में बताया गया है कि माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसी बीच जब उनके विवाह की बात भगवान विष्णु से होने लगी, तो माता पार्वती अपनी सखियों के साथ वन की ओर चली गईं।

वन में उन्होंने महादेव को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या आरंभ की। मान्यता है कि साधना के दौरान उन्होंने अपने हाथों से मिट्टी या रेत का शिवलिंग बनाया और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव का पूजन किया। उन्होंने रातभर जागकर तप और आराधना की। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।

इसी कथा की स्मृति में हरतालिका तीज पर मिट्टी या बालू से शिवलिंग बनाने की परंपरा मानी जाती है। इस तरह व्रत रखने वाली महिलाएं केवल भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा ही नहीं करतीं, बल्कि माता पार्वती के दृढ़ संकल्प, तपस्या और समर्पण को भी याद करती हैं।

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मिट्टी और बालू से ही शिवलिंग बनाने का क्या अर्थ है? - फोटो : Instagram

मिट्टी और बालू से ही शिवलिंग बनाने का क्या अर्थ है?
हरतालिका तीज पर मिट्टी से शिवलिंग बनाने की परंपरा का एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ माना जाता है। मिट्टी पृथ्वी तत्व का प्रतीक है और सनातन परंपरा में मानव शरीर को भी पंचतत्वों से निर्मित माना गया है। ऐसे में मिट्टी से शिवलिंग बनाना यह संदेश देता है कि ईश्वर की आराधना के लिए भौतिक वैभव या महंगी सामग्री आवश्यक नहीं है। पूजा में सबसे अधिक महत्व श्रद्धा, भावना और संकल्प का है।

पूजन के बाद मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन भी जीवन की नश्वरता का प्रतीक माना जाता है। इससे यह भाव जुड़ा है कि संसार की सभी भौतिक वस्तुएं अस्थायी हैं और अंततः प्रकृति में ही समाहित हो जाती हैं।

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हरतालिका तीज पर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा कैसे करें? - फोटो : Instagram

हरतालिका तीज पर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा कैसे करें?

  • मिट्टी या बालू से शिवलिंग के साथ भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की छोटी आकृतियां तैयार करें।
  • इन्हें एक साफ चौकी पर स्थापित करके सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें।
  • इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करें।
  • शिवलिंग पर जल, पंचामृत, चंदन, अक्षत, फूल और बेलपत्र अर्पित करें।
  • यदि शिवलिंग बालू से बनाया गया है, तो उस पर अधिक जल चढ़ाने से बचें। प्रतिमा के टूटने की आशंका हो तो केवल कुछ बूंदों से प्रतीकात्मक अभिषेक किया जा सकता है।
  • माता पार्वती को सिंदूर, चूड़ियां, मेहंदी और अन्य सुहाग सामग्री अर्पित करें।
  • हरतालिका तीज की व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।
  • भगवान शिव के मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करने के बाद आरती करें।
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पूजा के बाद मिट्टी की प्रतिमा का क्या करें? - फोटो : adobe

पूजा के बाद मिट्टी की प्रतिमा का क्या करें?
हरतालिका तीज व्रत के अगले दिन सुबह समापन पूजा और आरती के बाद मिट्टी से बनाई गई प्रतिमाओं का विसर्जन करने की परंपरा है। इसके बाद व्रती महिलाएं व्रत का पारण करती हैं।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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